उत्तराखंड में हाथियों की गिनती के नाम पर तमाशा हो रहा है। बंगलूरू की एक संस्था ने 2011-12 में हाथियों की गणना की थी, जिसे प्रमुख वन संरक्षक वन्यजीव/मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक ने खारिज कर दिया था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि हाथी की गिनती करना कितना मुश्किल है? हाथी कोई छोटा जानवर तो है नहीं कि वो बिल में छुप जाए जिस कारण उसकी गिनती न हो सकती।
यही नहीं अब उसी रिपोर्ट के आधार पर संस्थान को सात लाख रुपए का भुगतान कर दिया गया है। वन विभाग के अधिकारी इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से भी कतरा रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि ऊपर से पड़े दबाव में संस्था को भुगतान किया गया है।
रिपोर्ट विश्वसनीय नहीं
संस्था की शुरुआती रिपोर्ट में प्रदेश में हाथियों की संख्या एक से दो हजार के बीच बताई गई थी। इस आंकलन को बेतुका मानते हुए प्रमुख वन संरक्षक वन्यजीव ने रिपोर्ट को खारिज करते हुए भुगतान पर रोक लगा दी थी। लेकिन, अक्तूबर के पहले सप्ताह में राजाजी राष्ट्रीय पार्क ने संस्था को सात लाख रुपए का भुगतान कर दिया। सूत्रों का कहना है कि संस्था की संशोधित रिपोर्ट में हाथियों की संख्या 1400 बताई गई है। हालांकि इस रिपोर्ट को विश्वसनीय नहीं माना जा रहा है।
2010 की रिपोर्ट दब गई
जंगलात महकमे की ओर से 2010 में भी हाथियों की गणना कराई गई थी, लेकिन इसे जारी नहीं किया गया। इसके बाद बंगलूरू की संस्था से हाथियों की गणना कराने का निर्णय लिया गया था।
जिस तरह से हाथियों की गणना हुई है, उससे मैं आज भी संतुष्ट नहीं हूं। लेकिन, संस्था को जरूर भुगतान कर दिया गया है। हाथियों की वास्तव में कितनी संख्या है। यह भी बताना संभव नहीं है। -एसएस शर्मा, प्रमुख वन संरक्षक वन्यजीव