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कांग्रेस की इस सुरक्षित सीट पर घात लगाए बैठे हैं मोदी

Sun, 27 Apr 2014 10:15 AM IST
ऊधमसिंहनगर से अजित सिंह राठी
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अभी तक के लोकसभा चुनावों में नैनीताल संसदीय सीट पर भाजपा केवल दो बार ही जीत दर्ज कर सकी है। इस बार यहां मोदी की लहर की परीक्षा होनी है।
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हालांकि भाजपा 1980 में अस्तित्व में आई लेकिन इससे पहले भी जनसंघ व अन्य नामों से यह इसकी मौजूदगी क्षेत्र में रही। लेकिन नैनीताल का गढ़ कभी भेद नहीं पाई।

पहली बार भाजपा ने 1991 में रामलहर और 1998 में अटल लहर के बूते फतह किया। इस बार भाजपाइयों की उम्मीद मोदी लहर से है। उधर, कांग्रेस के सामने भी अपने इस सुरक्षित दुर्ग को बचाना बड़ी चुनौती है।
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भगत सिंह कोश्यारी का करियर दांव पर

मोदी लहर है और ऊधमसिंहनगर से भाजपा के हैवीवेट लीडर भगत सिंह कोश्यारी का करियर भी दांव पर लगा है।

मोदी लहर तो है लेकिन इस सीट के मजबूत कांग्रेसी दुर्ग होने से कौन इंकार कर सकता है। यदि इस तर्क के खिलाफ कोई कुतर्क खड़ा किया तो बड़ी भूल साबित होगी।

क्योंकि पिछली बार भी जो भाजपा प्रत्याशी बची सिंह रावत चुनाव हारे हैं वह केंद्र में मंत्री तो रह ही चुके हैं, उन्हें हरीश रावत को कुमाऊं से बेदखल करने का श्रेय भी जाता है। लेकिन 88 हजार वोटों से हारना पड़ा था।

मगर, कुछ रुझान भाजपा को राहत दे सकते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में तीन चौथाई सिख वोट कांग्रेस के पाले में गए थे।

हरभजन सिंह चीमा के क्षेत्र काशीपुर में भी भाजपा बुरी तरह से हारी थी। लेकिन इस बार खटीमा, सितारगंज, किच्छा के सिखों का रुझान भाजपा के पक्ष में दिख रहा है।

जबकि गदरपुर, बाजपुर, काशीपुर व जसपुर के सिक्ख कांग्रेस भाजपा में बंटते नजर आ रहे हैं। इसके अलावा मोदी लहर के चलते युवा व महिलाओं का रुझान भाजपा की तरफ दिख रहा है।

नैनीताल सीट का 1977 के बाद का खाका

वर्ष - विजयी पार्टी
1977 - भारतीय लोकदल
1980 - कांग्रेस
1984 - कांग्रेस
1989 - कांग्रेस
1991 - भाजपा
1996 - तिवारी कांग्रेस
1998 - भाजपा
1999 - कांग्रेस
2004 - कांग्रेस
2009 - कांग्रेस
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जान जोखिम में, फिर भी मुद्दा नहीं

ऊधमसिंहनगर को एक सड़क का जिला कहा जाता है। यानि इस जिले में मुख्य मार्ग एक ही है, और वह राष्ट्रीय राजमार्ग 74 है।

इस नेशनल हाईवे पर सफर करना दुर्घटना को बुलावा देना है। बिजनौर पार करने के बाद बॉर्डर से खटीमा तक इस मार्ग की लंबाई लगभग 170 किलोमीटर है। और, यह मार्ग चलने लायक केवल यूपी बॉर्डर से जसपुर तक ही है।

यानि बामुश्किल पंद्रह किलोमीटर। नेशनल हाईवे 74 जसपुर, बाजपुर, गदरपुर, रुद्रपुर व किच्छा होते हुए पुल भट्टा तक है।

वहां से बरेली के लिए डायवर्ट हो जाता है और दूसरा नया रूट खटीमा, चकरपुर की तरफ चला जाता है। लेकिन हालात इस कदर बिगड़े है कि जसपुर से खटीमा तक यह मार्ग चलने लायक बिल्कुल नहीं है।

हालात यह है कि जसपुर से खटीमा तक डेढ़ सौ किमी के रास्ते में डेढ़ दर्जन पुल पड़ते हैं लेकिन सड़क डबल और पुल सिंगल। कई पुल तो ऐसे है एक एक ही वाहन क्रास होता है।

लेकिन फिर भी चुनाव में यह कोई मुद्दा नहीं है। यूपी से उत्तराखंड में प्रवेश करते ही खस्ताहाल सड़कों का अहसास पहले ही पल में हो जाता है।
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