उत्तराखंड में गोमुख से उत्तरकाशी तक अधिसूचित ईको सेंसेटिव जोन की आंचलिक महायोजना में देरी से सामरिक महत्व की सैन्य योजनाएं भी प्रभावित हो रही हैं। सेना की इस क्षेत्र में अपनी हाई अल्टिट्यूट फील्ड फायरिंग रेंज (एफएफआर) प्रस्तावित है। राज्य सरकार अभी तक इस क्षेत्र के लिए आंचलिक महायोजना तैयार नहीं कर पाई।
अब सेना मार्च के अंत में सीएम और जीओसी इन सी मध्य कमान के बीच होने वाली प्रस्तावित सिविल मिलिट्री लायजनिंग बैठक में इस मुद्दे को उठाने की तैयारी कर रही है। उत्तराखंड में चीन सीमा के साथ सेना अपनी आर्टिलरी गन्स के अभ्यास के लिए फील्ड फायरिंग रेंज स्थापित करना चाहती है। चीन सेना जिस ऊंचाई पर तैनात है उसी के अनुरूप अभ्यास क्षेत्र सेना को सामरिक लिहाज से चाहिए।
हल्के और मध्यम दर्जे के तोपखाने के अभ्यास के लिए चयनित किया है। सेना 18 हजार फीट से ऊंचे क्षेत्र को अभ्यास की दृष्टि से बेहद उपयुक्त मान रही है। छह नवंबर 2012 को इसका प्रस्ताव सेना राज्य सरकार को दे चुकी है।
उत्तराखंड में अभी तक एक अधिग्रहित फील्ड फायरिंग रेंज आसन क्षेत्र में है। सामरिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील चीन सीमा पर सेना के विस्तारीकरण प्लान में आर्टिलरी की तैनाती राज्य में बढ़ाई जाने की तैयारी है। सेना के प्रस्ताव के बाद केंद्र ने गोमुख से उत्तरकाशी तक के क्षेत्र को ईको सेंसेटिव जोन अधिसूचित कर दिया। ईको सेंसेटिव जोन में निर्माण और भूमि हस्तांतरण की योजना राज्य सरकार अभी तक नहीं बना पाई। अब मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल में विचाराधीन है।
भूमि हस्तांतरण है बड़ा मुद्दा
सेना और राज्य सरकार के बीच नवंबर 2012 में हुई सीएमएलसी में कई सामरिक योजनाओं के लिए भूमि हस्तांतरण के मामलों पर सैद्धांतिक सहमति बनी थी, लेकिन तीन वर्ष में अधिकांश मामले वन भूमि की एनओसी के कारण लटके हुए हैं। चमोली में स्वतंत्र ब्रिगेड के लिए भूमि, गंगोत्री में एफएफआर के लिए भूमि और भारतीय सैन्य अकादमी को दी जानी वाली भूमि पर कोई निर्णय नहीं हुआ।