कंप्यूटर पर बनाया एरिया फिर निकला निष्कर्ष
शोध में जोशीमठ और भटवाड़ी से सैंपल लेकर वहां के एरिया को कंप्यूटर की मदद से तैयार किया गया। इसके बाद यहां पर बारिश का पानी, सीवेज वाले पानी और भूकंप का कंपोनेट डालकर देखा कि अगर भविष्य में यहां पर भूकंप आ जाए तो यहां की जमीन अपने धरातल से कितना अलग हट सकती है।
सिर्फ बारिश और सीवेज वाले पानी का निष्कासन वाली वजह देखेंगे तो एक दिन में 100 एमएम से अधिक बारिश होने पर यहां की जमीन 4 से 6 मीटर तक खिसक सकती है। वहीं अगर छह मैग्नीट्यूड से अधिक का भूकंप आता है तो यहां की जमीन 20 से 21 मीटर तक खिसक सकती है।
पर्यटन भी बड़ा कारण
डॉ. विपिन ने बताया कि इन स्थानों में पर्यटन भी स्थिति में बदलाव का एक बड़ा कारण है। जोशीमठ में नौ से 10 हजार लोग रहते हैं। पर्यटन सीजन में यहां अचानक 20 से 30 लाख लोग आ जाते हैं। इससे यहां की स्थिति में काफी बदलाव हो रहा है।
एक घर से रोज 70 लीटर पानी बह रहा
जोशीमठ में देखने को मिला कि एक घर में जहां चार से पांच लोग रहते हैं, वहां पर एक दिन में 60 से 70 लीटर पानी बहता है। वहीं, पर्यटन बढ़ने पर अगर 20 से 30 लाख लोग आ जाते हैं तो कितना पानी बहेगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। इस पानी के जमीन में जाने की वजह से वह कमजोर हो जाती है।
जमीन खिसकने में एक से दो और तीन महीने तक लग सकते हैं
वैज्ञानिक दृष्टि से यह देखा गया है कि किसी भी पहाड़ी क्षेत्र के ऊपर बने धरातल पर अधिक पानी बहता है तो वहां की जमीन खिसकने में एक से दो दिन और दो से तीन महीने भी लग सकते हैं। यहां पर मई से सितंबर तक पर्यटकों की भीड़ रही। सितंबर के बाद अक्तूबर-नवंबर छोड़कर दिसंबर से जमीन खिसकने लगी थी और दरारें आना शुरू हो गई थीं।
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- यह भारत का पहला शोध
डॉ. विपिन कुमार का दावा है कि यह भारत का पहला शोध है, जिसमें यह बताया गया है कि बारिश होने, सीवेज के पानी का ज्यादा बहाव होने या भूकंप आने पर जमीन कितना खिसक सकती है।