आपदा प्रबंधन की तैयारी का हाल क्या है इसका अंदाजा खतरे की पूर्व चेतावनी देने वाले तंत्र की स्थिति से लगाया जा सकता है।
जून की आपदा ने दिखाया था सच
मौसम का कोई भरोसा नहीं है। इसके बावजूद चार धाम आने वाले यात्रियों की सुरक्षा सेटेलाइट फोन और वाच टावर पर तैनात जवानों के हाथ में होगी।
यह तब है जबकि पहाड़ पर आपदा अचानक आती है और संभलने का एक पल का वक्त भी कई बार प्रभावित होने वाले लोगों को नहीं मिल पाता।
उत्तराखंड में चारों धाम उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित हैं। उच्च हिमालयी क्षेत्र भू स्खलन, अचानक आने वाली बाढ़ के लिहाज से खासा संवेदनशील है। बीते 16-17 जून की आपदा ने इस बात को बहुत अच्छे तरीके से साफ भी कर दिया था।
पर इतना होने के बावजूद प्रदेश का आपदा प्रबंधन तंत्र अभी तक खतरे की पूर्व चेतावनी देने का विश्वसनीय तंत्र भी विकसित नहीं कर पाया है।
2013 की आपदा के तुरंत बाद ही जोर शोर से यह कहा गया था कि खतरे की पूर्व चेतावनी का पूरा तंत्र विकसित किया जाएगा पर एक साल बाद भी स्थिति जस की तस है।
बाढ़ को लेकर तंत्र पूरी तरह से लाचार
भारी बरसात या ग्लेशियर के टूटने से आने वाली बाढ़ को लेकर यह तंत्र पूरी तरह से लाचार है। सरकार ने हालांकि सेटेलाइट फोन की व्यवस्था की है।
इसके अलावा ऊंचाई वाले इलाकों में पुलिस को वाच टावर स्थापित करने को कहा गया है। पर यह व्यवस्था भी ठीक उसी तरह चरमरा सकती है जैसे 2013 की आपदा के दौरान रामबाड़ा की व्यवस्था चरमरा गई थी।
आपदा की भयावहता का अंदाजा सरकार को पूरे चार दिन बाद हो पाया था। मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ की पूर्व चेतावनी देने का काम मूल रूप से केंद्रीय जल आयोग करता आया है।
आयोग नदियों में पानी के स्तर पर नजर रखता है और इसके लिए उसने कई स्थानों पर मापक उपकरण भी लगाए हैं। पर हिमायल क्षेत्र से निकलने वाली नदियों पर इस तरह के उपकरण नहीं लगे हैं।
2013 की आपदा के बाद कहा यह गया था कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों की मॉनिटरिंग भी की जाएगी, पर ऐसा हुआ नहीं।