माल एवं सेवा कर (जीएसटी) में लागू होने के बाद माल को परिवहन करने के लिए ई-वे बिल जनरेट करना अनिवार्य है। जीएसटी में पंजीकृत व्यापारी व फर्म को माल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिए ऑनलाइन ई-वे बिल बनना पड़ता है। यह प्रक्रिया बड़ी आसान है। लेकिन माल गंतव्य स्थान तक पहुंचा या नहीं, इस पर कोई निगरानी नहीं है। जिस वजह से ई-वे बिल की प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं।
ई-वे बिल में करोड़ों का फर्जीवाड़ा सामने आने से राज्य कर अधिकारियों ने इस बात को माना कि जीएसटी लागू होने से ई-वे बिल की प्रक्रिया आसान हो गई है। जीएसटी पंजीकृत व्यापारियों को माल बेचने और खरीदने के लिए जीएसटी वेबसाइट पर ऑनलाइन ई-वे बिल अनिवार्य है। तभी वे माल को परिवहन कर सकते हैं। ई-वे बिल जनरेट करते समय व्यापारी का जीएसटीएन नंबर, क्रेता और विक्रेता की जानकारी, सामान का ब्योरा और वाहन नंबर की जानकारी देनी होती है।
सवाल यह है कि कोई भी व्यापारी ई-वे बिल जनरेट कर सकता है। लेकिन माल गंतव्य स्थान तक वास्तव में पहुंचा या नहीं, इसकी जांच नहीं होती है। ई-वे बिल से गलत ढंग से माल की बिक्री और खरीद दिखाते हैं। जिससे टैक्स रिटर्न कम भरने के साथ ही आईटीसी (इनपुट टैक्स क्रेडिट) का क्लेम करते हैं।
हालांकि ई-वे बिल में माल परिवहन करने के लिए समय भी निर्धारित है। जिसमें प्रतिदिन के हिसाब से किमी. तय हैं। वहीं, माल परिवहन करने वाला वाहन रास्ते में खराब हो जाता है तो दूसरे वाहन से माल परिवहन करने के लिए ई-वे बिल में जानकारी देने का प्रावधान है। इसके बावजूद भी ई-वे बिल में फर्जीवाड़ा सामने आने से प्रक्रिया और चेकिंग सवालों के घेरे में है।