सेना के लिए विकसित की जा रही मिसाइलों के इंफ्रा रेड सीकर्स के डिटेक्टर अब डीआरडीओ खुद तैयार करेगा।
सीकर्स में लगा डिक्टेक्टर
मिसाइल
के सीकर्स में लगा डिक्टेक्टर लक्ष्य का पता लगाकर दिशा और रेंज निर्धारित
करता है। डीआरडीओ ने अब तक इजराइल आदि देशों से डिटेक्टर खरीदता रहा है।
सात सौ करोड़ की लागत से आप्ट्रोनिक फेब्रिकेशन सुविधा स्थापित करेगा, जो दो बरस के भीतर उपकरण तैयार कर लेगा।
अग्नि
मिसाइल के जनक और डीआरडीओ प्रमुख अविनाश चंद्रा ने यंत्र अनुसंधान एवं
विकास संस्थान देहरादून में बताया कि मिसाइल दुश्मन को पहचान कर टारगेट
लक्ष्य तक पहुंचने के लिए इंफ्रारेड सीकर्स लगे होते हैं।
डीआरडीओ खुद विकसित करेगा डिटेक्टर्स
इन
सीकर्स में डिटेक्टर लगा होता है जो निशाने की पहचान करता है। अब तक
डीआरडीओ इजराइल सहित कुछ अन्य देशों से डिटेक्टर्स खरीद रहा है, लेकिन अब
डीआरडीओ इसे खुद विकसित करने जा रहा है।
उन्होंने बताया कि आप्टिक्स
के क्षेत्र में भारतीय नौसेना की पनडुब्बियों के लिए जायरो स्कोप डीआरडीओ
विकसित कर रहा है। इसका सफलता पूर्वक ट्रायल हो गया है और यह तकनीक विश्व
के चुनिंदा देशों के पास है।
अनुसंधान को मिलता है कम बजट
रक्षा
अनुसंधान के क्षेत्र में होने वाले खर्च को डीआरडीओ प्रमुख अविनाश चंद्र कम
मानते हैं। विदेशों से खरीद के लिए रक्षा बजट का 25 फीसदी सरकार खर्च कर
रही है, लेकिन अनुसंधान में मात्र पांच फीसदी ही दिया जा रहा है।
ऐसे
में विदेशों पर निर्भरता समाप्त करना आसान नहीं है। चंद्रा ने कहा कि
रक्षा अनुसंधान में लगी प्रयोगशालाओं को ज्यादा बजट मिलना चाहिए।
अनुसंधान कार्य हो रहे हैं तेजी से
डीआरडीओ
पर धीमी गति से शोध करने के साथ हथियारों की तकनीक विकसित करने में कई दशक
लग जाने चंद्रा ने कहा कि अक्सर अनुसंधान में अधिक समय लगता है।
विदेशों
के मुकाबले ही हमारे रक्षा अनुसंधान चल रहे हैं बावजूद इसके अब डीआरडीओ
अपनी छोटी परियोजना को न्यूनतम सात वर्ष और बड़ी परियोजनाओं को 15 वर्ष में
पूरा करने का लक्ष्य लेकर चल रहा है।