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यह जनजाति नहीं करती है लक्ष्मी की पूजा

Thu, 31 Oct 2013 01:11 PM IST
अमर उजाला, पिथौरागढ़
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दीपावली में वह न तो धन की देवी की पूजा करते हैं बल्कि भैया दूज का भी त्योहार नहीं मनाते। त्योहारों के देश भारत में होली और दीपावली का बहुत महत्व है। दुनिया भर के लोग भी होली और दीपावली का त्योहार मनाने के लिए भारत पहुंचते हैं लेकिन अपने ही देश में एक जनजाति ऐसी भी है जो दीपावली का त्योहार नहीं मनाती यह हिमालय की आदम जनजाति वनरावत है।
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वनरावतों में लक्ष्मी पूजन की कोई परंपरा नहीं है। वह रामायण और महाभारत के प्रसंगों के आधार पर देश को एकसूत्र में पिरोने वाले किसी पर्व या त्योहार को नहीं मनाते। भैया दूज का भी वनरावतों में कोई प्रचलन नहीं है।

घनेनाथ और मनेनाथ की करते हैं पूजा
उत्तराखंड में वनरावतों के 11 गांव हैं। इन गांवों में इनकी आबादी 556 है। वनरावत ‘घनेनाथ’ और ‘मनेनाथ’ नाम के दो लोक देवताओं का पूजन करते हैं। लोक देवता की पूजा के समय किसी प्रकार का वैदिक अनुष्ठान नहीं होता। लोक देवता के मंदिर में जाकर यह लोग बकरी की बलि देते हैं और पूजा संपन्न मानी जाती है।
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वनरावतों की जीवनशैली का गहन अध्ययन कर चुके हीरा सिंह बोरा का कहना है कि वनरावतों की संस्कृति में होली और दीपावली के लिए कोई स्थान नहीं है। यह बात अलग है कि अब यह लोग समाज के अन्य लोगों से घुल मिल गए हैं। कम से कम पहनावा, खानपान में बदलाव आने लगा है लेकिन सांस्कृतिक बदलाव इतनी जल्दी आ पाना संभव नहीं है।
 
नहीं आते बाजार
समाज विज्ञानी डा. मजूमदार ने वनरावतों को अदृश्य व्यापारी (अनविजुअल ट्रेडर्स) की संज्ञा दी थी। वनरावत पहले आम जनता के बीच आने से कतराते थे, 1974 तक यही स्थिति रही। धीरे-धीरे सरकारी और स्वयंसेवी संगठनों के प्रयासों से वह मुख्यधारा में आने लगे हैं। कट्यूड़ा गांव निवासी वनरावत जगत सिंह कहते हैं कि उनकी संस्कृति में दीपावली, लक्ष्मी पूजन, भैया दूज मनाने की कोई परंपरा नहीं है। हो सकता है कि आने वाली पीढ़ी इसे किसी रूप में अपनाने लगे।
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