हे बाबा केदार! ऐसी दीपावली फिर कभी नहीं आए। यह निराशा भरे शब्द उजाले के त्यौहार दीपावली पर केदारघाटी के गांवों से सुनने को मिल रहे हैं।
उत्तराखंड में दीपावली का पर्व केदार घाटी के लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है। क्योंकि दीपावली के एक दिन बाद भैया दूज के मौके पर केदारनाथ मंदिर के कपाट बंद होते हैं। स्थानीय तीर्थ पुरोहित और व्यापारी छह माह केदार रह कर घरों को लौटते हैं।
पिता का लौटने का इंतजार
केदार यात्राकाल में तीर्थ पुरोहित और व्यापारी अच्छा-खासा पैसा कमा कर घर लौटते थे, तो सही मायनों में लक्ष्मी आती थी। लेकिन इस बार लक्ष्मी तो क्या कई लोग अपने घर नहीं लौटे।
साढ़े चार माह पूर्व जलप्रलय में अपनों को खो चुके लोगों की पीड़ा दीपावली पर पुन: उभर गई है। दीपावली पर बच्चों को अपने पिता के घर लौटने का इंतजार रहता है। इस बार मां अपने बच्चों से क्या कहे, यह समझ नहीं आ रहा है।
पसरा सन्नाटा
केदारघाटी के दीवली, भणिग्राम, लमगौंडी, ल्वारा, ल्वाणी, बणसू, बड़ासू, देवर, जाल, चिलौड़ और चौमासी सहित कई गांवों में दीपावली पर मातम पसरा हुआ है।
ल्वाड़ी निवासी बांके लाल बगवाड़ी ने अपने सात परिजन केदारनाथ आपदा में खो दिए। वह कहते हैं कि घर में विधवा बहुओं और बच्चों का दर्द देखा नहीं जाता है।
उनके पुत्र श्रीश बगवाड़ी की दो बालिकाएं 10 वर्षीय सृष्टि व आठ वर्षीय खुशबू, भतीजे सुधाकर के बच्चे 14 वर्षीय साकेत व आठ वर्षीय प्राची, प्रभाकर का पांच वर्षीय पुत्र शुभ्रत और हेमचंद्र का 11 वर्षीय वरुण की आंखें दीपावली के पर्व पर पापा को खोज रही हैं
दिलमी का दिनेश नौटियाल भी आपदा में लापता हो गया था। उसके चार वर्षीय पुत्र भविष्य की समझ में नही आ रहा है कि दीपावली आ गई है, लेकिन पापा घर क्यों नहीं आ रहे हैं। यही हाल दीवली भणिग्राम के तिवारी और लमगौंडी के लालमोरिया व बाजपेयी परिवार के है।