नैनीताल हाईकोर्ट ने आपदा राहत घोटाले की जांच सीबीसीआईडी को सौंप दी है।
हरिद्वार में 2010-11 में आई आपदा में राज्य सरकार की ओर से लगभग दो हजार लोगों को राहत राशि बांटी गई। बाद में पता चला कि ये लोग अस्तित्व में ही नहीं हैं। अब इस मामले की जांच सीबीसीआईडी करेगी।
कोर्ट ने छह माह के भीतर इसकी रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने के भी निर्देश दिए। मुख्य न्यायाधीश बारिन घोष एवं न्यायमूर्ति वीके बिष्ट की संयुक्त खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई।
हरिद्वार निवासी अनिल कुमार वर्मा ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि हरिद्वार में वर्ष 2010-11 में आई आपदा में प्रभावित लोगों को राहत देने के लिए केंद्र सरकार की ओर से पैसा आया था।
अस्तित्व में ही नहीं आपदा राहत राशी पाने वाले
जनहित याचिका में कहा गया कि उस राहत राशि में लगभग 24 लाख रुपए हरिद्वार प्रशासन की ओर से ऐसे दो हजार व्यक्तियों को वितरित करना बताया गया था जो अस्तित्व में ही नहीं हैं।
इस प्रकरण में पूर्व में कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिए थे कि उनकी ओर से बताए गए लगभग दो हजार व्यक्तियों जिनको धनराशि देना बताया गया है।
उनको मुकदमे में पक्षकार बनाते हुए उनकी पहचान संबंधी दस्तावेज कोर्ट में दाखिल करें लेकिन राज्य सरकार की ओर से कोई कार्यवाही नहीं की गई।
पांच अधिकारियों पर गिर सकती है गाज
मामले में एसडीएम हरिद्वार की ओर से शपथपत्र दाखिल कर हरिद्वार जिले के पांच अधिकारियों जिसमें तत्कालीन डीएम भी शामिल हैं, के नाम कोर्ट को बताए।
साथ ही कहा गया कि राहत राशि का वितरण इन पांच अधिकारियों की ओर से किया गया है।
पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 17 मई को फैसला सुनाते हुए सीबीसीआईडी को इस प्रकरण पर रिपोर्ट दर्ज कर जांच करने के निर्देश दिए हैं।
साथ ही न्यायालय ने छह माह में उसकी रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा है।
सुप्रीम कोर्ट में उत्तराखंड सरकार ने दिया आश्वासन
केंद्र और उत्तराखंड सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में आश्वासन दिया कि राज्य में भयंकर बाढ़ और मूसलाधार बारिश के चलते गत वर्ष जैसा नुकसान अब दोबारा नहीं होगा। इसके लिए सभी कदम उठाए गए हैं।
जस्टिस बीएस चौहान व जस्टिस एके सीकरी की पीठ के समक्ष केंद्र और राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने कहा कि इस साल शुरू हो चुकी चारधाम यात्रा के लिए सभी प्रबंध किए गए हैं।
यात्रा की गहन निगरानी की जा रही है। दोनों सरकारों के इस आश्वासन पर पीठ ने यात्रा पर रोक लगाने और बचाव के कदम उठाने के लिए निर्देश जारी करने की मांग को अस्वीकार कर दिया।
उत्तराखंड की मौजूदा स्थिति बहुत महत्वपूर्ण
साथ ही याचिकाकर्ताओं को हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने का निर्देश दिया।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कालिन गोंसालविस ने दलील दी कि राज्य की मौजूदा स्थिति बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि चारधाम यात्रा जारी है। ऐसे में बचाव के ठोस उपाय जरूरी हैं।
सालिसिटर जनरल मोहन परासरन पीठ के समक्ष गोंसालविस की दलील को नकारते हुए कहा कि बचाव समेत सभी कदम पहले ही उठाए जा चुके हैं।
गत वर्ष जैसा नुकसान इस बार दोबारा नहीं होगा। केंद्र और राज्य सरकार की ओर से इस मामले में कोई लापरवाही नहीं बरती गई है। लगातार निगरानी की जा रही है।
वहीं राज्य सरकार के अधिवक्ता ने भी परासरन की दलील का समर्थन किया और अदालत को आश्वासन दिया कि हरसंभव कदम उठाए जा चुके हैं।
पीठ ने केंद्र और राज्य सरकार की ओर से दिए गए आश्वासन पर याचिकाकर्ता से कहा कि अदालत इस मामले में कोई आदेश नहीं जारी कर रही है।
हालांकि पीठ ने बचाव के कदमों पर निर्देश जारी करने की मांग हाईकोर्ट के समक्ष उठाने की छूट प्रदान कर दी।