राजधानी देहरादून में संशोधित मास्टर प्लान में परत दर परत खामियां सामने आ रही है। मौके पर गलत भू उपयोग दिखाने के कारण आम आदमी की परेशानियां एक बार फिर जस की तस बनी हुई नजर आ रही है।
इससे भविष्य में न केवल एमडीडीए अभियंताओं की उगाही बढ़ जाएगी बल्कि आम जनता को बेवजह चक्कर काटने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। उत्तरांचल इंजीनियर्स एवं ड्राफ्टमैन वेलफेयर एसोसिएशन के अध्ययन में फिर कुछ नए मामले प्रकाश में आए है।
केस-1
मसूरी रोड पर एक होटल बन रहा है। एमडीडीए की ओर से इस होटल का मानचित्र भी पास है, लेकिन संशोधित मास्टर प्लान में इसे जंगल दिखाया गया है।
संशोधित मास्टर प्लान के अनुसार मौके पर एक ईट होटल मालिक नहीं रख सकता। एमडीडीए के अधिकारी भी कुछ नहीं कर सकते। उन्हें भी मास्टर प्लान के अनुसार होटल स्वामी के खिलाफ कार्रवाई करना पड़ेगा।
केस-2
पुरुकुल गांव के पास लगभग 150 बीघे जमीन का भू उपयोग कृषि से बदलकर आवासीय कराया गया था। इसके लिए राजकीय कोष में शुल्क भी जमा किया गया, लेकिन संशोधित मास्टर प्लान में आज भी मौके पर कृषि दर्शाया गया है। ऐसे में मौके पर लेआउट पास कराने में परेशानी खड़ी हो सकती है।
केस-3
फूलसैनी के पास टिहरी विस्थापितों की एक पुरानी कालोनी है। यहां लगभग 100 से अधिक परिवार के लोग रहते है, लेकिन मास्टर प्लान के अनुसार उक्त भूमि पर खेती हो रही है।
हालांकि इन विस्थापितों को मानचित्र पास कराने की कोई बाध्यता नहीं है। इसके बावजूद भविष्य में परेशानी खड़ी हो सकती है।
केस-4
कारगी से जुड़े कुछ क्षेत्रों को तो राहत मिल गई है, लेकिन कारगी ग्रांट के तमाम इलाकों को आज भी राहत नहीं मिल पाई है।
आईएसबीटी की ओर से कारगी चौक से पहले वाले इलाकों को आज भी सरकारी और अर्धसरकारी क्षेत्र में दर्शाया गया है। जबकि, इन इलाकों में तेजी से कालोनियां बनाई जा रही है।
तकनीकी अफसर बताता था दांव पेंच
संशोधित मास्टर प्लान में फेरबदल करवाने के लिए एमडीडीए का एक तकनीकी अफसर पूरा दांव पेंच बताता रहा। यह वहीं अफसर है, जिसके सलाह पर 50 फीसदी से अधिक बदलाव मास्टर प्लान में किया गया।
यह अफसर नीली बत्ती वाली गाड़ी से भी संपर्क में था। इससे मास्टर प्लान का बेड़ा इतना अधिक गर्क हो गया है कि आम आदमी को एक दशक से अधिक समय तक एमडीडीए से लेकर शासन तक के चक्कर काटने के लिए भटकना पड़ेगा।