मेघा बताती हैं कि करीब चार वर्ष पूर्व जब वह ट्रांसपोर्टनगर में पहुंचीं तो यहां कई वंचित बच्चों को देखा। वे कभी स्कूल नहीं गए थे। जब उनके सामने से इंग्लिश मीडियम स्कूल के बच्चे गुजरते थे, तो वे बच्चे उन्हें देखते रहते थे।
जब मैंने उन बच्चों से पूछा तो उन बच्चों ने भी स्कूल जाने की इच्छा जाहिर की, लेकिन उनके परिजनों के लिए दो वक्त की रोटी का बंदोबस्त करना ही मुश्किल होता था। इस कारण वे बच्चों के भविष्य के बारे में नहीं सोच पाते थे।
परिजनों को जागरूक करना भी चुनौती
मेघा कहती हैं कि बच्चों को शिक्षा देना उतना कठिन नहीं, जितना बच्चों के परिजनों को मनाना। गरीबी के बीच रहकर परिजन शिक्षा के महत्व को समझ नहीं पाते और अपने बच्चों का भविष्य भी अंधकार में धकेलते हैं। इसलिए ऐसे परिजनों को समझाने में बेहद मेहनत करनी पड़ती है। उनके राजी होने के बाद ही बच्चों को क्लास में शामिल करते हैं।