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दलितों के मसीहा के जाने पर नम हुई आंखें

Mon, 18 Nov 2013 09:37 AM IST
अमर उजाला, देहरादून
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वरिष्ठ साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि की शवयात्रा देहरादून के रायपुर रोड स्थित उनके आवास से शुरू हुई। रविवार शाम तीन बजे नालापानी शमशान गृह पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। वाल्मीकि के भतीजे ने उनकी चिंता को मुखाग्नि दी।
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ये लोग रहे मौजूद
इस मौके पर हर आंख नम हो उठी। इस दौरान साहित्य, लेखन से जुड़े कई मशहूर नाम सुभाष पंत, जितेन ठाकुर, लीलाधर जगूड़ी, गुरदीप खुराना, कृष्णा खुराना, राजेश पाल, राजेश सकलानी, प्रमोद सहाय, रूपनारायण सोनकर समेत राज्य सफाई कर्मचारी आयोग के अध्यक्ष भगवत प्रसाद मकवाना, सुनील, मदन वाल्मीकि, जयपाल सिंह, धर्मपाल, बीएस कंवल, डीपी सिंह आदि मौजूद रहे।

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उधर, ओमप्रकाश वाल्मीकि के निधन पर श्रद्धांजलि देने वालों का तांता रहा। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने वाल्मीकि के निधन को साहित्य की अपूरणीय क्षति करार दिया। कहा कि दलित साहित्य का एक मजबूत स्तंभ ढह गया।
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ऑल इंडिया डिफेंस इंप्लॉयज फेडरेशन के कार्यकारिणी सदस्य अनिल उनियाल, इंप्लॉयज यूनियन आयुध निर्माणी के महासचिव अशोक शर्मा ने भी ओमप्रकाश वाल्मीकि के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। इसे हिंदी साहित्य का बड़ा नुकसान करार दिया। बता दें कि ओमप्रकाश वाल्मीकि आर्डिनेंस में सहायक कार्य प्रबंधक (एडब्लूएम) के पद से सेवानिवृत्त हुए थे।

‘जूठन’ से छाए रचना आकाश पर
1950 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जनपद स्थित बरला गांव में जन्मे ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन’ बेहद चर्चा में रही। तकरीबन 18 साल पहले यानी 1997 में आई इस रचना में उन्होंने अपने उन कड़वे अनुभवों का जिक्र किया था, जिसका सामना उन्हें कई बार अपने छात्र जीवन में करना पड़ा। शादी के वक्त और उसके बाद भी वह इस पीड़ा का दंश झेलने को मजबूर हुए।

यह लघु कथा, कविता संग्रह भी चर्चित
ओमप्रकाश वाल्मीकि के लघु कथा संग्रह ‘सलाम’ (2000) और ‘घुसपैठिए’ (2004) काफी सराहे गए। दलित इतिहास पर प्रकाश डालता ‘सफाई देवता’ (2009) भी बहुत चर्चित हुआ। उनके कविता संग्रहों ‘अब और नहीं’ के साथ ही ‘सदियों का संताप’ और ‘बस बहुत हो चुका’ भी बेहद चर्चा में रहे। उन्होंने ‘दलित साहित्य का सौंदर्य शास्त्र’ (2007) भी रचा, जो बेहद पसंद किया गया।
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