पटाखों और आतिशबाजी से निकले खतरनाक कण और गैसें करीब एक हफ्ते तक दून की हवा में मंडराते रहेंगे। शहर के घाटी में बसा होने की वजह से यह स्थिति बनती है।
पर्यावरण विज्ञानियों के मुताबिक, दस माइक्रो ग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से कम लेविल वाले आरएसपीएम (रिस्पाइरेबल संस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर) धूल कण और गैसें हवा में मिल जाती हैं। सामान्य स्थिति में प्रदूषक कण गैस के साथ हवा में ऊपर उठकर दूर तक चले जाते हैं, लेकिन दून शहर के मामले में ऐसा नहीं होता है।
दरअसल, ये खतरनाक कण गैस के साथ पहाड़ियों से टकराकर वापस दून घाटी की फिजां में ही तैरते रहते हैं। इसलिए राहत तभी मिल पाएगी जब ये खतरनाक कण जमीन में लौटेंगे। नमी के साथ मिलकर धीरे-धीरे गैस की मात्रा भी समाप्त होने लगती है।
बारिश होने पर मिलेगी राहत
उत्तराखंड पर्यावरण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी एसएस राणा ने बताया कि बारिश होने की स्थिति में हवा में घूम रहे खतरनाक कण नीचे आ जाएंगे। इसके अलावा तापमान कम होने पर भी ये कण नीचे आते हैं।
सेहत का रखें ख्याल
खतरनाक कणों से करीब एक हफ्ते सेहत को सीधा खतरा रहेगा। दून अस्पताल के वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. केसी पंत के मुताबिक, इससे खासकर सांस के रोगियों, बुजुर्गों और बच्चों को दिक्कत होती है। सांस के रोगी जरूरी होने पर ही बाहर निकलें।
अपनी नियमित रूप से ली जाने वाली दवा, इनहेलर साथ रखें। सांस के रोगी, बुजुर्ग और बच्चे बाहर निकलने पर मुंह में मास्क का इस्तेमाल करें। इन गैसों से आंख और त्वचा में खुजली, जलन और एलर्जी होने की आशंका ज्यादा रहती है। इसके लिए फुल आस्तीन के कपड़े पहनें और चश्मा लगाएं। किसी भी तरह की परेशानी होने पर डॉक्टर की सलाह लें।