जेब जलाने के लिए प्लास्टिक पूरी तरह तैयार है। डॉलर के मुकाबले रुपये के लगातार गिरने से प्लास्टिक पर सीधे प्रभाव पड़ेगा।
इससे कटलरी महंगी होने जा रही है। इसके साथ ही दवाएं भी महंगी होंगी। उन पर भी बड़े पैमाने पर प्लास्टिक का प्रयोग होता है। इसके अलावा विभिन्न वाहनों के कंपोनेंट्स भी प्लास्टिक के बने होने के कारण इनका भी महंगा होना तय है।
दरअसल, प्लास्टिक क्रूड आयल का बाय प्रोडक्ट है। क्रूड आयल के दाम उछलने की वजह से प्लास्टिक के रेट बढ़ेंगे ही। उधम सिंह नगर, रुद्रपुर समेत दून को मिलाकर पूरे प्रदेश भर में तकरीबन 150-200 मेन्यूफैक्चरिंग यूनिट्स हैं।
रुपये के गिरने का इन पर सीधा फर्क पड़ने जा रहा है। फिलहाल प्रदेश भर का प्लास्टिक के कारोबार का सालाना टर्न ओवर तकरीबन हजार करोड़ का है।
15-20 प्रतिशत फर्क लाजिमी
प्लास्टिक कारोबारियों पर पहले के मुकाबले 15-20 फीसदी का फर्क पड़ना लाजिमी है। इनकी प्रोसेसिंग लागत निश्चित रूप से बढ़ जाएगी। यह बढ़ी लागत अंत में उपभोक्ता की जेब पर ही असर डालेगी।
बढ़ेगा खर्च
रुपये में गिरावट का सबसे ज्यादा असर माइक्रो स्मॉल और प्लास्टिक इंडस्ट्री पर पड़ने जा रहा है। यूनिट्स का खर्च बेतहाशा बढ़ जाएगा। डॉलर की बढ़त और रुपये की स्थिति देखते हुए व्यवसायी, उद्योगपति में भय व्याप्त है। संसद सत्र के बाद देखिए क्या हालात होते हैं।
- पंकज गुप्ता, प्रदेश अध्यक्ष, इंडस्ट्रीज एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड (आईएयू)
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