फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बिना सरकारी शह के अपराधी माफिया नहीं बन सकते : पूर्व डीजीपी प्रशांत कुमार

Sat, 13 Dec 2025 02:42 AM IST
देहरादून ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, देहरादून
विज्ञापन
विज्ञापन

विज्ञापन
दूसरे सत्र में पूर्व डीजीपी प्रशांत कुमार ने कहा कि यदि सरकार ने अपराध और अपराधियों को जीरो टॉलरेंस का निर्देश दे दिया तो कहीं भी कोई अपराधी जड़ें नहीं जमा सकता। उत्तर प्रदेश में वही पुलिस बल, वही न्यायिक अधिकारी और वही पुलिस अधिकारी रहे, लेकिन 2017 में सरकार के स्पष्ट निर्देश मिलने के बाद कुख्यात अपराधियों का सफाया हो गया। उप्र में जितने बड़े माफिया थे, उन्हें चिह्नित किया गया, जिनमें जितने मारे गए, उतने ही सलाखों के पीछे भी पहुंचे। जाहिर है कि सरकारी शह के बिना अपराधी जड़ें नहीं जमा सकते। इस सत्र में डीजीपी उत्तराखंड अशोक कुमार और लेखक अनुरुध्य मित्रा ने प्राची कंडवाल के साथ बातचीत की। चर्चा में भारत के अपराध परिदृश्य की वास्तविक जमीनी चुनौतियों और अनुभवों को साझा किया गया।

-



जीरो टॉलरेंस के साथ इको सिस्टम भी आवश्यक

पूर्व डीजीपी प्रशांत ने कहा कि अपराध माफिया के सफाए के लिए सरकारी इच्छाशक्ति के साथ इको सिस्टम की आवश्यकता पड़ती है। उप्र में साल 2017 के मुकाबले पुलिस का बजट ढाई गुना बढ़ चुका है, जिसका लाभ पुलिसिंग को मिला। इसकी वजह से ही राज्य में निवेश और विकास बढ़ा। यह सच है कि साल 2017 से पहले तक नेता अपराधियों की मदद लेते थे, फिर अपराधियों को लगने लगा कि क्यों न वही नेताओं की जगह ले लें, जिसकी वजह से अपराधी विधायक और सांसद बने। इसी आड़ में जेल के भीतर से भी अपराधी ठेके लेते थे। उस दौरान गवाहों की हत्या और बम फेंकना जैसे अपराध आम थे, तब मानव अधिकारों की बात करने वाले भी खामोश रहते थे।
विज्ञापन




उन्होंने कहा कि दुनिया की सबसे बड़ी सिविल पुलिस फोर्स आज उत्तर प्रदेश की है, जब वो 360 डिग्री परिवर्तन से गुजरी है, जिसका प्रभाव पूरे सिस्टम में दिखता है। विकास दुबे कोई आम अपराधी नहीं था, उसने बिकरू कांड को एक बड़े और सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया था। वह वही अपराधी था जिसने थाने के अंदर एक मंत्री की हत्या कर दी थी। वर्षों तक व्यवस्था और पुलिस दोनों ही ऐसे अपराधियों को सहने के लिए मजबूर थे। किसी भी पुलिस ऑपरेशन के दौरान यह कोई नहीं जानता कि गोली किसे लगेगी। पुलिस को कार्रवाई भी करनी है और जांच भी।

इस दौरान पूर्व डीजीपी अशोक कुमार ने कहा कि 1991 में उन्हें शुरुआती चार्ज प्रयागराज का मिला था, जहां अतीक अहमद का वर्चस्व बढ़ रहा था। उन्होंने नजदीक से देखा कि कैसे राजनीतिक शह से एक अपराधी कुख्यात हुआ और माफिया की तरह जड़ें फैलाता गया, लेकिन साल 2017 से सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति के बाद उन्होंने उप्र को बदलते देखा। बीते आठ सालों में उप्र की कानून व्यवस्था में बहुत सुधार हुआ है।



उन्होंने कहा कि सिनेमा में अपराधियों को इस कदर महिमामंडित किया जाता है कि कई बार अपराधी हीरो बनने लगते हैं और यह समाज के लिए बेहद दुखद है। हमें किसी भी रूप में अपराधियों को ग्लैमराइज्ड नहीं करना चाहिए। इसके बजाय, हमें असली पुलिस अधिकारियों की कहानियों पर फिल्में बनानी चाहिए और उनकी बहादुरी को सामने लाना चाहिए।

विकास दुबे मामले की कार्रवाई ने समाज में एक बहुत बड़ा संदेश दिया। यह एक अति आवश्यक कदम था। तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता पुलिसकर्मियों की हत्या पर सवाल नहीं उठाते, वे सिर्फ एनकाउंटर पर सवाल उठाते हैं। उन्हें पुलिस और उनके बलिदानों पर भी बात करनी चाहिए।
विज्ञापन




-



मुख्तार अंसारी हाथ में एके-47 ऐसे लेकर चलता था, जैसे गिटार

वहीं, लेखक अनुरुध्य मित्रा ने कहा कि अक्सर यह दिखाया या बताया जाता है कि जिस अपराधी का बचपन अभाव और प्रताड़ना में बीता या गरीबी देखी, वह आसानी से ज्यादा रुपये कमाने की चाह में कुख्यात हो गया, लेकिन मुख्तार अंसारी जैसे अपराधियों के मामले में यह सच नहीं है। उसकी बैकग्राउंड बहुत संपन्न परिवार से थी लेकिन वह एके-47 गिटार की तरह लेकर चलता था।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें