बाहरी दुनिया के लिए ये अपराधी हैं। किसी के हाथ खून से रंगे हैं तो कोई शातिर चोर। अपने अपराधों की सजा वे भुगत रहे हैं। देहरादून की सुद्धोवाला जिला जेल में कोई उम्रकैद काट रहा है तो कोई पांच, दस साल की सजा। लेकिन उनकी उम्र सजा के दिन गिनने में नहीं कट रही।
विज्ञापन
बेड़ियों में बंधे हाथ उनकी नई जिंदगी गढ़ रहे हैं। दरअसल, जेल पहुंचने से पहले इन कैदियों में से कोई कारपेंटर था, कोई माली, कोई टेलर तो कोई इलेक्ट्रिशियन। जेल के भीतर उनका हुनर जिंदा रहे, इसके लिए जेल प्रशासन ने खास पहल की।
कभी हथियार थामने वाले कैदियों के हाथों में औजार पकड़ा दिए और अब ‘कालकोठरी’ में इन कैदियों का हुनर रोशनी बिखेरने लगा है।
सुनील हत्या के प्रयास के मामले में सजा काट रहा है। जेल आने से पहले वह टेलर था। अब वह जूते बनाने लगा है। जेल में सुनील जब जूते की मशीन पर काम करने जुटता है, उसके हाथों की तेजी देखने लायक होती है। सुनील कहता है, जेल में नया काम सीखा। अब वक्त का पता नहीं चलता।
विज्ञापन
जेल में आकर बदल गई इनकी जिंदगी
सजायाफ्ता रोशन जेल में बिजली ब्रांच का सहायक प्रभारी है। जेल में बिजली जाए, कनेक्शन में परेशानी हो तो सब उसे याद करते हैं। रोशन कहता है, जेल में रहकर ओपन बोर्ड से आईटीआई के बाद जिंदगी बदल गई। जेल में जब आया था, बहुत टेंशन रहती थी। अब मन शांत रहता है।
सहारनपुर चौक पर फर्नीचर की दुकान करने वाले रविस खान हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं। काम आता ही था, जेल में मौका मिला तो मुराद पूरी हो गई। रविस कहते हैं, मेरे बनाए मेज-कुर्सी, सोफे की तारीफ होती है तो खुशी मिलती है। चाहते हैं हुनर का और प्रदर्शन करें।
पार्क की तरह नजर आती है जेल जेल प्रशासन ने करीब दो सौ कैदियों के हुनर को पहचाना और सबको उस हिसाब से काम दिया। जिला जेल की तस्वीर अब किसी पार्क की तरह नजर आती है। कैदियों की मेहनत से पथरीली जमीन पर चारों ओर हरियाली उग आई है।
बैरकों के बाहर फुलवारी है, जबकि मिनी नर्सरी भी तैयार की जा चुकी है। नर्सरी से पौधे बिक्री के लिए भेजे जाते हैं तो इनके साथ के लिए सीमेंट के गमले और गमलों के लिए लोहे के स्टैंड भी कैदी ही तैयार करते हैं।
सात माह में साढ़े पांच लाख कमाई
कैदियों के बनाए गमले, कारपेट, फर्नीचर खूब पसंद किए जाते हैं। महज सात माह में जेल प्रशासन इन सामान की बिक्री से साढ़े पांच लाख रुपये की कमाई कर चुका है।
हाल में परेड ग्राउंड में लगे सरस मेले में ही जेल प्रशासन के स्टाल पर 97 हजार रुपए का सामान बिका। आम लोगों के लिए सामान उपलब्ध कराने के लिए जेल के बाहर खास प्रदर्शनी भी लगाई गई है।
फर्नीचर, कारपेट की खास मांग कैदियों के बनाए फर्नीचर की भी खास डिमांड है। हाल में उत्तरकाशी के चिन्याली स्थित एक कॉलेज में 2,30,160 रुपए की कुर्सी-मेज सप्लाई की गई है।
आईजी जेल विनोद शर्मा ने सोफा सेट और कंप्यूटर टेबल बनवाई है, जबकि डीएवी इंटर कॉलेज देहरादून को 90,250 रुपए के मेज-कुर्सी बेची गई। इसके अलावा कैदियों को एक हजार कारपेट और आसन बनाने का आर्डर भी मिला है। इन दिनों कैदी इसी काम में जुटे हुए हैं।
जेल का हर काम अब बंदियों के हाथ में है। हर छोटे-बड़े निर्माण की जिम्मेदारी उन पर ही है। इन दिनों कैदी शौचालय बना रहे हैं। बिजली मरम्मत का काम भी कैदी करते हैं, जबकि नियमों का पालन कराने में भी उनकी मदद ली जाती है।
जल्द बनाएंगे जूते जेल में हाल ही में जूता निर्माता एक कंपनी ने मशीनें उपलब्ध कराई हैं। एक नवंबर से तीस कैदियों को जूते बनाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। जल्द ही जेल में बने जूते भी बिक्री के लिए तैयार होंगे।
हो रही कमाई भी जेल मानकों के अनुरूप सजायाफ्ता कैदियों को श्रमदान के रुप में 30 रुपए प्रतिदिन दिए जाते हैं। बंदी किसी ट्रेड में अतिरिक्त क्षमता दिखाता है तो यह राशि बढ़कर 45 रुपए हो जाती है।
प्रदेश की दून, हरिद्वार और हल्द्वानी जेल में बंदियों के उद्यमिता विकास को कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। बंदियों की उनके कौशल के हिसाब से काम दिया जाता है। काम के बदले कंपनियों की ओर से मिलने वाला पैसा सीधे बंदियों के बैंक खाते में जमा किया जाता है। - विनोद शर्मा, आईजी जेल
अप्रैल से अब तक साढ़े पांच लाख का राजस्व मिला है। मांग बढ़ गई है, लेकिन संसाधन कम होने से हम माल तैयार नहीं कर पा रहे। फर्नीचर, कंप्यूटर टेबल, गमलों और कारपेट के सबसे ज्यादा आर्डर आते हैं। कई बड़ी कंपनियों ने काम कराने के लिए संपर्क किया है। जेल में सब्जी उत्पादन भी शुरू हो चुका है। बंदियों को उनकी क्षमता के हिसाब से दायित्व दिया जाता है। प्रयास है कि काम को और बढ़ाया जाए। - राकेश वर्मा, डिप्टी जेलर, सुद्धोवाला कारागार