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विज्ञान और पुलिस के गठजोड़ से दरिंदे सलाखों के पीछे

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Arrest
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ब्यूरो/अमर उजाला।

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देहरादून। पुलिस की सतर्कता और उम्दा तकनीक (विज्ञान) के चलते दरिंदों का बचना अब मुश्किल सा हो रहा है। दुष्कर्म के मुकदमों में डीएनए रिपोर्ट सजा का अहम आधार बन रही है। कई मामलों में गवाहों से लेकर मुद्दई तक मुकर गए, बावजूद प्रदेश की अदालतें डीएनए और अन्य वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर दोषियों को सजा दिलाने में कामयाब हो रहीं हैं। राज्य में डीएनए जांच की व्यवस्था की बात की जाए तो यहां वर्ष-2012 में विधि विज्ञान प्रयोगशाला शुरू की गई थी। दुष्कर्म व अन्य अपराधों के सिलसिले में हर वर्ष प्रयोगशाला में करीब 700 जांचें की जाती हैं।

पीड़िता व गवाह मुकरे, लेकिन दुष्कर्मी 10 साल के लिए अंदर
घटना अक्तूबर 2014 को रुद्रपुर में हुई। मूक बधिर युवती को एक दरिंदे ने अपनी हवस का शिकार बनाया। प्रभावशाली आरोपी के दबाव में सारे गवाह और वादी तक मुकर गए। लेकिन, डीएनए जांच रिपोर्ट आरोपी के खिलाफ आई। उसमें दुष्कर्म की पुष्टि हुई। अदालत ने उसी आधार पर दोषी को दस साल की कैद की सजा सुनाई।
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पीड़िता के कपड़ों पर बाल बने सजा का आधार
22 नवंबर 2015 को रायपुर क्षेत्र से नाबालिग का अपहरण कर उससे दुष्कर्म किया गया था। आरोप क्षेत्र के रॉबिन नाम के युवक पर था। पीड़ित पक्ष के कई लोग इससे मुकर गए। लेकिन, विज्ञान की जांच ने उसे सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। पीड़िता के कपड़ों पर आरोपी के बाल मिले थे। डीएनए जांच में यह बाल रॉबिन का निकला और उसे आठ साल की सजा सुनाई गई।

डीएनए रिपोर्ट बनी फांसी का आधार
त्यूनी क्षेत्र से एक किशोरी का अपहरण कर अजहर खान नाम के व्यक्ति ने उससे दुष्कर्म किया था। गवाहों की लंबी फेहरिस्त थी। कुछ मुकरे तो कुछ अपने बयानों पर कायम रहे। लेकिन, विज्ञान की जांच पुख्ता थी। पीड़िता के शरीर से मिले आरोपी के बालों आदि की डीएनए जांच में पुष्टि हुई। अदालत ने पिछले दिनों अजहर को फांसी की सजा सुनाई है।

सिर्फ एक माह के मामले लंबित
विधि विज्ञान प्रयोगशाला पंडितवाड़ी में डीएनए की जांच होती है। वर्ष 2012 से पहले डीएनए टेस्ट चंडीगढ़ और दिल्ली की प्रयोगशालाओं में होते थे। वर्तमान में यहां वैज्ञानिकों की संख्या बढ़ाने से जांचों में तेजी आई। मौजूदा समय में मात्र एक महीने की जांच लंबित हैं। एक जांच में कम से कम 15 दिन और ज्यादा से ज्यादा छह माह लग सकते हैं।

पोक्सो के मामलों में जांच रिपोर्ट की समय सीमा दो माह
पोक्सो के मामलों में डीएनए जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए दो माह की समय सीमा निर्धारित है। वैज्ञानिकों के अनुसार घटना के तत्काल बाद लिए जाने वाले सैंपलों की प्राथमिकता के आधार पर जांच की जाती है। यही कारण है कि पोक्सो के मुकदमों में एक से डेढ़ साल के भीतर ही फैसले सुनाए जा रहे हैं।
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विधि विज्ञान प्रयोगशाला को और आधुनिक बनाया जा रहा है। जल्द नए विशेषज्ञों की भर्ती की जाएगी। यहां ऑडियो-वीडियो जांच लैब भी शुरू की जा रही हैं। पोक्सो के मामलों में नियमानुसार समय सीमा के आधार पर काम किया जाता है।
- अमित सिन्हा, डायरेक्टर विधि विज्ञान

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