सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की पहाड़ में रेगुलर पुलिस स्थापित करने की ताकीद को नजरअंदाज करना भारी पड़ रहा है।
पहाड़ में बढ़ते जा रहे संगीन अपराध पहले से ही काम के बोझ पटवारियों से बेकाबू होते जा रहे हैं। संसाधन और कौशल हीन राजस्व पुलिस के स्थान पर शिद्दत के साथ रेगुलर पुलिस की जरूरत महसूस होने लगी है।
बुधवार को अल्मोड़ा में हुए ट्रिपल मर्डर केस जैसी दर्जनों वारदातें एक महीने के भीतर हुई हैं।
2010 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वीएस सिरपुकर व जस्टिस एके पटनाइक की खंडपीठ ने बागेश्वर के सुंदर सिंह के मामले की सुनवाई में राज्य सरकार को राजस्व पुलिस के स्थान पर रेगुलर पुलिस की तैनाती की ताकीद की थी।
लेकिन चार साल के अरसे में कागजी घोड़े दौड़ाने के अलावा सरकार ने इस दिशा में कुछ भी नहीं किया।
पहाड़ में पटवारियों को पुलिस के अधिकार
ब्रिटिश हुकूमत के दौरान 1861 में जारी आदेश से पहाड़ में पटवारियों को पुलिस के अधिकार दिए गए थे। 153 साल बाद भी लागू यह व्यवस्था औचित्यहीन हो चली है।
अल्मोड़ा में बुधवार को हुआ ट्रिपल मर्डर केस तो मात्र उदाहरण है। हिल एरिया में क्राइम ग्राफ का बढ़ते जाना चिंता का विषय है।
जुलाई में ही कुमाऊं के ही एक जिले में राजस्व पुलिस की कस्टडी में हुई कैदी की मौत पुलिस ट्रेनिंग का अभाव दर्शाती है।
पुलिस की भी भूमिका निभाने वाला पटवारी एक ही क्षेत्र में वर्षों तैनाती के बाद स्थानीय लोगों से इतना घुलमिल जाता है कि क्राइम कंट्रोल के बजाय वह ‘दूसरे’ रास्ते खोजने लगता है।
वैसे पुलिस व्यवस्था के लिहाज से पटवारी भी पूरे नहीं हैं। पर्वतीय इलाकों में 950 पटवारी पुलिस सर्किल हैं, इनमें से 350 पद रिक्त हैं। 1998 में पटवारी के पद पर विधिवत भर्ती नहीं हुई।
2004 में एक बाद भर्ती हुई लेकिन घोटाला हो गया। इसके बाद 2009 में सरकार ने कुछ मृतक आश्रितों व विभाग से ही कर्मियों को पदोन्नत कर पटवारी बनाया गया लेकिन पूर्ति नहीं हुई।
राजस्व पुलिस की समस्या
पटवारी को राजस्व कार्य, दैवी आपदा, जमीन संबंधी कार्य, प्रमाण पत्र बनाना, निर्वाचन व अन्य कार्य, भूलेख संबंधी कार्य, प्रशासनिक कार्य, योजनाओं का धरातल पर क्रियान्वयन करना, योजनाओं की प्रगति रिपोर्ट डीएम को देने जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के साथ पुलिसिंग वर्क करना होता है।
नये थानों के प्रस्ताव पर अनिर्णय की स्थिति
पहाड़ में रेगुलर पुलिस का क्षेत्र बढ़ाने के लिए पीएचक्यू ने 29 नए थाने बनाने का प्रपोजल शासन को भेजा है। इनमें 21 चौकियों को अपग्रेड करना है और आठ नए थाने खोले जाने हैं।
त्यूणी, मोरी, लम्बगांव, थत्यूड़, थलीसैंण के अलावा अल्मोड़ा में दन्या, चम्पावत में पाटी और बागेश्वर में कांडा में थाना खोला जाना प्रस्तावित है। लेकिन वित्त विभाग बार-बार आपत्ति लगा देता है।
वैसे इस मुद्दे पर भी दो पक्ष हैं। पुलिस विभाग चाहता है कि पटवारियों से पुलिस का काम ले लिया जाए, जबकि राजस्व विभाग इसके विरोध में है। क्योंकि यह बिना किसी अन्य खर्चे वाली पुलिस है। लेकिन अभी तक किसी स्तर पर निर्णय की स्थिति नहीं बन सकी।
राजस्व पुलिस : नाकामी की लंबी फेहरिस्त
चूंकि राजस्व पुलिस के पास रेगुलर पुलिस जैसे न तो संसाधन हैं, न ही कौशल और न पर्याप्त वक्त। इसलिए कई बार संगीन मामलों में उसकी पड़ताल सवालों के घेरे में आ जाती है।
गंभीर मामलों में राजस्व पुलिस की नाकामी की फेहरिस्त बड़ी लंबी है। कुछ चर्चित मामलों का ब्योरा पेश है।
रचना हत्याकांड में भारी लापरवाही
वर्ष 2012 में कोटद्वार के दुगड्डा के पास झवाणसारी की 17 वर्षीय रचना की हत्या कर शव जंगल में डाल फेंक दिया।
नौ अगस्त को गायब रचना की गुमशुदगी की रिपोर्ट 10 अगस्त को परिजनों ने लिखवाई थी। लेकिन राजस्व पुलिस ने मामले की छानबीन नहीं की। 13 अगस्त को रचना का शव जंगल में सड़ी-गली हालत में मिला था।
राजस्व पुलिस ने इसके बाद भी भारी लापरवाही बरती। बाद में जनता के भारी दबाव से मामला रेगुलर पुलिस में चला गया था। जिसमें आरोपी को कोर्ट से सुबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था।
गायब बच्चों का नहीं पता
चैलूसैंण बाजार में बिहार के रहने वाले एक परिवार के दो मासूम बच्चे इसी साल एक जून को गायब हो गए थे।
राजस्व पुलिस में गुमशुदगी दर्ज की गई, लेकिन राजस्व पुलिस इस मामले में सुस्त रही। अब मामला रेगुलर पुलिस को सौंप दिया गया।
विकासखंड द्वारीखाल के एक दिखेत गांव की 22 वर्षीय आरती देवी का शव घर पर पंखे से लटका मिला था। परिजनों की तहरीर पर मामला राजस्व पुलिस में दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज है।
जिसमें सास, ससुर और पति को आरोपी बनाया गया है। सास-ससुर गिरफ्तार हो चुके हैं, लेकिन पति की गिरफ्तारी नहीं हुई है। परिजन अब सीबीसीआईडी से जांच की मांग कर रहे हैं।
लाखों की चोरी का नहीं हुआ खुलासा
द्वारीखाल ब्लाक के परसुलीखाल गांव में 14 मई 2012 को हरीश बिंजोला के घर में लाखों की चोरी हुई थी। लेकिन चोरी का अब तक खुलासा नहीं हो पाया है।
बिंजोला परिवार मामले की रेगुलर पुलिस से जांच की मांग उसी वक्त से करते आ रहे हैं। लेकिन न मामला रेगुलर पुलिस में गया और न चोरी का खुलासा हो पाया।