हरिद्वार कुंभ में 160013 यात्रियों की मौत हुई। शोध करने पर राबर्ट कोच ने पाया कि इसका कारण गैस्ट्रो इंटेस्टाइनल इंफेक्शन था। 1881 से 1896 तक सबसे अधिक लोग प्रभावित हुए। कुंभ के साथ ही यह पंजाब लाहौर फिर अफगानिस्तान, ईरान, दक्षिणी रूस और यूरोप तक फैला। 1892 से 95 तक दुनिया के कई देश इसकी चपेट में आ चुके थे। 1879 हरिद्वार कुंभ से लेकर 1948 इलाहाबाद अर्द्ध कुंभ तक हैजा के कारण 22,29,866 तीर्थयात्रियों की मौतें हुईं।
इनमें हरिद्वार में ही 14354997 लोग शामिल थे। 1906 कुंभ में ब्रिटिश सरकार के कई सैनिक व सिविल अफसर भी इसका शिकार बने। प्रयागराज के एक कब्रिस्तान में दर्जनों ऐसी कब्रें हैं, जिनके ऊपर लगे पत्थर पर उनकी मौत के कारण का उल्लेख है। इनमें बच्चे से लेकर वृद्ध तक शामिल हैं। कुछ कब्रें पति-पत्नी की, पति की मौत रात में हुई तो पत्नी की अगली सुबह। हालांकि 1906 के पहले 100 अर्द्ध कुंभ 1994 कुंभ और 1918 कुंभ में भी सैकड़ों ब्रिटिश सैनिक व अफसर हैजे की चपेट में आए। 1891 के कुंभ को तो कुछ शोध पत्रों में महामारी कुंभ के रूप में उल्लेखित किया गया है। इसके बाद 1927 के अर्द्धकुंभ में लगभग डेढ़ लाख लोगों की मौतें हुईं।