दून अस्पताल में अब तक 15 बच्चों का आईसीयू और चार बच्चों को वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखकर इलाज किया जा चुका है। अन्य बच्चों का उपचार भी किया जा चुका है। एक साल से कम उम्र वाले बच्चों को तो कोरोना समेत किसी भी तरह के संक्रमण का बहुत अधिक जोखिम होता है। जहां तक घर में बच्चों के ठीक होने का सवाल है तो संक्रमित होने के बाद अभिवावक डॉक्टरों की सलाह पर जरूरी दवाएं दे रहे हैं। इम्युनिटी अच्छी होने पर बच्चे जल्दी ठीक हो जाते हैं। स्थिति गंभीर होने पर बच्चों को अस्पताल जरूर लाएं।
-डॉ. अशोक कुमार, विभागाध्यक्ष बाल रोग विभाग, राजकीय दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल
एक तो बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है। दूसरा बच्चों में इंजाइटी नहीं होती है। बच्चों में सामान्य प्रकार के तमाम टीके लगाए रहते हैं, उससे भी विभिन्न रोगों के खिलाफ शरीर में एंटीबॉडी पैदा होती रहती है। शारीरिक रूप से कमजोर या अन्य बीमारियों से पीड़ित बच्चों में संक्रमण का खतरा ज्यादा रहता है। संक्रमित बच्चों का डॉक्टर की सलाह पर घर में ही इलाज किया जा सकता है। संक्रमित होने पर बच्चों को इलाज की जरूरत नहीं पड़ती, यह बात निराधार है। बच्चों को संक्रमण से बचाने के लिए उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाएं।
-डॉ. प्रताप सिंह रावत, वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ राजकीय जिला गांधी शताब्दी अस्पताल
अस्पतालों में ज्यादातर गंभीर बीमार बच्चे ही आ रहे हैं। ज्यादातर बच्चों को अभिभावक डॉक्टरों से परामर्श लेकर घर पर ही दवा दे रहे हैं। बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता वयस्कों से अच्छी होती है। ऐसे में स्वस्थ बच्चों को वायरस ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा पाता। ऐसा नहीं है कि बच्चे बिना उपचार के ठीक हो जाते हैं। बल्कि तीसरी लहर में तो बच्चों में ही ज्यादा संक्रमण की आशंका जताई जा रही है। इसका कारण यह भी है कि वयस्कों का टीकाकरण हो रहा है। ऐसे में बच्चों का खास ख्याल रखने की जरूरत है।
-डॉ. तन्वी सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर एवं वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ राजकीय दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल