उत्तराखंड सरकार राष्ट्रपति की मुहर वाले लोकायुक्त बिल पर चढ़ा खंडूरी का रैपर हर हाल उतारना चाहती है।
संशोधन पक्का
सरकार भाजपा को इसका क्रेडिट नहीं देना चाहती है लिहाजा संशोधन पक्का है। सरकार विशेषज्ञों की राय भी ले रही है साथ ही अपनी पार्टी के नेताओं को भी टटोल रही है कहीं किसी संशोधन को लेकर अपनी पार्टी में विरोध न शुरू हो जाए।
नये लोकायुक्त बिल में इस तरह से संशोधन की तैयारी है ताकि इसकी आत्मा भी न मरे और संशोधन को लेकर सरकार भी न घिरे। अपने विधायकों की रायशुमारी के लिए सरकार ने इसीलिए दो बार बैठक स्थगित की ताकि उनके सामने बदलाव का ठोस प्रारूप रखा जा सके।
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लोकायुक्त बिल को लेकर सरकार 17 नवंबर को अपने विधायकों के साथ बैठेगी। विधायकों से भी संशोधन को लेकर सुझाव मांगे हैं। सरकार ऐसा कोई भी परिवर्तन नहीं चाहती जिससे फजीहत हो। क्योंकि इस लोकायुक्त बिल को लेकर 2011 में कांग्रेस ने भी हामी भरी थी।
फिर गृह मंत्रालय केबाद राष्ट्रपति की मुहर लग गई। ऐसे में सरकार पर दबाव भी है कि जो भी परिवर्तन हो उसे लेकर देहरादून से दिल्ली तक स्वीकार कर लिया जाए। क्योंकि सरकार के बदलाव को भाजपा राजनीतिक मुद्दा भी बना सकती है।
सदस्यों की पूरी बेंच के फैसले को लेकर पेंच
सरकार इस मुद्दे को लंबा भी नहीं खींच सकती है। 4 सितम्बर को मंजूरी के बाद से लोकायुक्त कानून लागू होने की 180 दिनों की मियाद में एक-एक दिन खिसक रही है। दरअसल बिल की धारा 18 को लेकर सबसे अधिक दिक्कत है। जिसमें जनप्रतिनिधियों को इसके दायरे में तो रखा गया है लेकिन सात सदस्यों की पूरी बेंच के फैसले को लेकर पेंच दिख रहा है।
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कानून विभाग विशेषज्ञों से विभिन्न धाराओं पर विचार कर संशोधन का खाका तैयार कर रहा है। सरकार यह मैसेज नहीं देना चाहती कि वह इस कानून के दायरे से किसी को बचाने का काम कर रही है। जबकि भाजपा कतई नहीं चाहती थी उसकी सरकार में पारित लोकायुक्त कानून में कोई संशोधन हो।
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