कांग्रेसियों का तर्क है कि जब पूरे देश में कांग्रेस का सफाया हो गया तो उत्तराखंड में भी होना ही था। लेकिन इस लचर तर्क के खोल में प्रदेश सरकार और प्रदेश के कांग्रेसी अपनी नाकामियों को छिपा नहीं सकते।
यह मिथ अपनी कमजोरियों और नाकामियों को छिपाने के लिए बनाया गया है। पूछा जाना चाहिए कि यदि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में मोदी लहर नहीं दिखाई दी तो क्यों?
ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को 34 सीटें और जयललिता की एआईडीएमके को लोकसभा की 37 सीटें मिलने से साफ पता चलता है कि अपने-अपने प्रदेशों में दोनों देवियों की खूब चली है।
नवीन पटनायक ने चौथी बार बनाई सरकार
इसी तरह उड़ीसा में बीजू जनता दल के नवीन पटनायक ने चौथी बार सरकार बना ली।
नए राज्य तेलंगाना में टीआरएस और आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की सरकार बन गई। अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस की तो सिक्किम में एसडीएफ (सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट) की सरकार बनने जा रही है।
यह ट्रेंड साफ कहता है कि जिन्होंने जनता के लिए काम किया, जनता ने उनका साथ दिया। वहां कोई लहर नहीं चली।
कांग्रेस की गुटबाजी भी रही एक वजह
जब रावत सीएम बने तो उनके विरोधी खेमे ने उनका असहयोग शुरू कर दिया। हालांकि रावत ने अपने विरोधियों को साथ लेकर चलने का काफी प्रयास किया।
लेकिन जिस तरह से सतपाल महाराज चुनाव से ऐन पहले भाजपा में चले गए और विजय बहुगुणा का परिवार काफी देर तक चुनाव लड़ने के लिए ही तैयार नहीं हुआ, इससे साफ है कि कांग्रेस के अंदर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।
चुनाव के दौरान भी पार्टी में खेमेबाजी साफ देखी गई। एक गुट के कार्यकर्ताओं ने दूसरे गुट के प्रत्याशी को हराने का ही काम किया है। एक गुट के दूसरे गुट को सबक सिखाने के चक्कर में कांग्रेस के पंजे से पांचों सीटें निकल गईं।
प्रदेश सरकार की पांच नाकामियां
- आपदा राहत का बेहतर प्रबंधन नहीं कर पाना
- आपदा पीड़ितों तक दुख दर्द बांटने में कोताही
- सरकारी मशीनरी पर कोई नियंत्रण नहीं होना
- जनता को सड़क, पानी जैसी सुविधाएं न दे पाना
- जनता के हित में लिए फैसलों का जमीन पर न उतरना