राज्य बनने के बाद कांग्रेस का सांगठनिक रिकॉर्ड देखा जाए तो पता चलता है कि यहां प्रदेश अध्यक्ष बनना-बदलना दोनों ही मुश्किल है।
उत्तराखंड बने 13 साल हो गए हैं, प्रदेश ने सात मुख्यमंत्री देख लिए, लेकिन कांग्रेस अध्यक्षों की संख्या दो में ही अटकी है। कई बार कांग्रेस को अध्यक्ष न बदल पाने के कारण नियम बदलने पड़े।
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एक व्यक्ति एक पद
अब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जनार्दन द्विवेदी ने एक व्यक्ति एक पद की बात कहकर अध्यक्ष पद की चिंगारी और सुलगा दी है।
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ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए कुमाऊं से प्रदीप टम्टा और महेंद्र पाल जबकि गढ़वाल से सतपाल महाराज, हीरा सिंह बिष्ट और प्रीतम सिंह दौड़ में हैं।
दौड़ में सांसद
इसमें भी सबसे सशक्त लड़ाई दोनों सांसदों प्रदीप टम्टा और सतपाल महाराज के बीच है। जब राज्य अस्तित्व में आया कांग्रेस की कमान हरीश रावत के हाथ में थी।
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रावत के नेतृत्व में ही कांग्रेस ने पहला विधानसभा चुनाव जीता, लेकिन मुख्यमंत्री बना दिया गया एनडी तिवारी को, जबकि श्री रावत माने बैठे थे कि यह पद उन्हें मिलेगा।
डटे रहे हरीश
एनडी तिवारी को सीएम बनाने के बाद कांग्रेस हाईकमान की भी रावत को अध्यक्ष पद से हटाने की हिम्मत नहीं हुई। रावत ने अपने दो कार्यकाल पूरे किए।
2007 में कांग्रेस सरकार जाने के बाद ही उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया। इसके बाद अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी मिली यशपाल आर्य को।
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कानून बदला अध्यक्ष नहीं
यशपाल आर्य भी अपने दूसरे कार्यकाल में हैं। उनका पहला कार्यकाल 2010 में खत्म हो गया था। कांग्रेस के बदले कानून के अनुसार आर्य का दूसरा कार्यकाल 2015 तक है।
हालांकि, इसे लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं में अब भी स्थिति स्पष्ट नहीं है कि पांच साल का कानून केवल राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए है कि प्रदेश अध्यक्षों के लिए भी। खैर जो भी हो फिलहाल प्रदेश में कांग्रेस अध्यक्ष बनने के लिए जोर आजमाइश शुरू हो गई है।