फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कृषि मंत्री है ये प्रत्याशी पर गांव का ही हाल है बेहाल

Sun, 20 Apr 2014 07:01 PM IST
गंगा असनोड़ा थपलियाल/अमर उजाला, श्रीनगर
विज्ञापन
विज्ञापन
जानकर अचरज होगा कि वर्तमान में पौड़ी संसदीय सीट से कांग्रेस प्रत्याशी और कृषि मंत्री हरक सिंह रावत के गांव गहड़ के ही खेत बंजर हैं। यहां के लोग खेती इसलिए नहीं करते कि जंगली पशु फसल चौपट कर जाते हैं।
विज्ञापन


तस्वीरों में देखिए, 'पाताल' में भारत का एक मतदान केंद्र

दूरी श्रीनगर से सिर्फ तीन किलोमीटर है मगर रास्ता काफी जोखिम भरा है। गांव पर पलायन का साया है। अधिकांश युवा रोजगार के लिए पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में प्राइवेट नौकरियां कर रहे हैं।

उपनल में भी गिने-चुने दो-तीन युवक नौकरी करते हैं, कुछ जीवीके में लगे हैं जो पैदल ही आते-जाते हैं। गांव ठेठ पहाड़ी गांव की ही तरह मुश्किलों से दो-चार हो रहा है।
विज्ञापन

बदहाल रास्तों पर गांव तक पहुंचना दुश्वार

वाहन नहीं मिल पाएगा, यह जानकर मैं अपने फोटो पत्रकार साथी के साथ स्कूटी से ही हरक सिंह के गांव गहड़ की हकीकत जानने के लिए निकल पड़ी।

पढ़‌िए, यहां पर नहीं है प्रत्याशी को प्रचार करने की इजाजत

स्वीत पुल के समीप राजकीय मेडिकल कालेज की कालोनी के समीप ही गहड़ गांव को जोड़ने वाले 10 किमी लंबे हल्के वाहन मोटर मार्ग को भारी वाहनों के लायक बनाने का शिलान्यास संबंधी पत्थर दिखा।

पढ़‌िए, हम तो भइया 'नेता जी' के साथ

पत्थर फरवरी 2013 का है। दो कदम भी सड़क नहीं बन पाई है। कई वर्ष पहले हल्के वाहनों के लिए रास्ता पक्का बनाया गया था, टूट-फूट के चलते अब सड़क जैसी चीज नजर नहीं आती।

अलबत्ता, निशान कहीं-कहीं दिखाई दे जाते हैं। कई जगह पुश्ते टूटे हुए हैं। यदि कोई गिरे, तो सीधे करीब 25-40 मीटर गहरी खाई में गिर जाए।

कृषि मंत्री के गांव में खेती नहीं होती

सात मुहल्लों नारायण खील, तल्ली बसोल्यूं, मल्ली बसोंल्यूं, गहड़, छोड़ा, डढेली तथा ओडला से मिलकर बनी गहड़ ग्राम सभा करीब 8 किमी.दायरे में फैली हुई है।

पढ़‌िए, किसी प्रत्याशी में नहीं यहां वोट मांगने जाने का दम

यहां ग्रामीण खेती नहीं करते। पशुपालन पर जोर है। गांव की लक्ष्मी देवी, ऊषा देवी आदि महिलाएं बताती हैं खेती से कुछ फायदा नहीं है, क्योंकि सुअर फसल बर्बाद कर देते हैं।

गांव में रह रहे करीब 80 परिवारों में से 70 के पास कम से कम एक भैंस या गाय जरूर है। आज भी लकड़ी जैसे ईंधन को ग्रामीण इस्तेमाल कर रहे हैं।

खुद ग्राम प्रधान शोभा भंडारी के घर पर एक भैंस है और वह चूल्हे में लकड़ी से खाना बनाती हैं। ग्रामीण कहते हैं कि गैस के इंतजार में परेशान होना पड़ता है, इसलिए रसोई गैस को इमरजेंसी में प्रयोग करते हैं।

ये है मंत्री के पुश्तैनी घर का हाल

मल्ली बसोल्यूं में डा.हरक सिंह रावत का पैतृक आवास है, जहां उनका जन्म हुआ। भवन बेहद खराब हालत में है। यहां एक गरीब महिला सजिता रहती है। (हरक के परिवार से रिश्ता जोड़कर) कहती है कि उनकी सास (डा.हरक की मां इंद्र देवी) ने उसे यह घर रहने के लिए दिया है।

हां, इसी भवन के नीचे की ओर करीब 25-30 आम के पेड़ों का बागान है। लेकिन दूसरी जमीन बंजर है।

हरक के माता-पिता और छोटे भाई का परिवार श्रीकोट में रहता है। कभी-कभी उनकी मां जरूर गांव आती रहती हैं।

पुश्तैनी मकान तक नहीं जाते हरक

कभी-कभार हरक भी आते हैं, मगर पुश्तैनी मकान में नहीं जाते। अपने चचेरे भाई के घर पर ही कुछ देर टिकते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि कुछ समय पहले हरक आए थे। पूछने पर कि कब आए थे यह नहीं बता पाते।

तस्वीरों में देखिए, 'पाताल' में भारत का एक मतदान केंद्र

राजकीय उच्चतर हाईस्कूल तक की शिक्षा के बाद बालिकाओं को राजकीय इंटर कालेज देवलगढ़ या स्वीत का सहारा लेना पड़ता है। यह गांव से कम से करीब तीन किमी दूर है।

गांव की लड़कियां प्राइवेट ही पढ़ाई कर रही हैं। खास बात यह है कि गांव से लगे इस गांव में आज भी 311 लोग रहते हैं, लेकिन कोई भी बुजुर्ग यहां दिखाई नहीं दिया।
विज्ञापन

‘मेरा बेटा जो कहेगा, वो करेगा’

गहड़ से लौटते हुए स्वीत-गहड़ मोटर मार्ग पर बड़ी संख्या में बुजुर्ग मिले। ये लोग इस मार्ग पर घूमते हैं, क्योंकि इस पर वाहन नहीं चलते।

इन्हीं बुजुर्गों की टोली में अपने साथियों के साथ हरक की मां इंद्रा देवी भी दिखाई दीं।

उनसे पूछा कि वे प्रचार के लिए जाना चाहेंगी, तो कहने लगीं कि मेरा हरक प्रचार में खुद सक्षम है, जो कहेगा उसे करके दिखाएगा।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें