दुर्गम में करीब 25 वर्ष तक सेवा। तीन साल पहले पति का निधन, 55 वर्ष से अधिक की आयु। इसके बावजूद सरकार का सिस्टम मानने को तैयार नहीं है कि उत्तरा पंत बहुगुणा का तबादला कर दिया जाए। ऐसा केवल उत्तरा के साथ नहीं है। सच तो यह है कि प्रदेश में ऐसी हजारों उत्तरा हैं, जो सिस्टम के फेर में फंसी हुई हैं। इनके लिए दुर्गम से सुगम में तबादला किसी युद्ध को जीतने से कम नहीं है।
अलग उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से ही ट्रांसफर-पोस्टिंग उद्योग यहां जमकर फला-फूला है। तबादलों की कोई स्पष्ट नीति न होने के कारण रसूखदारों और नेताओं व अफसरों के चहेतों को तो मनमाने तबादले का लाभ मिलता रहा लेकिन आम कर्मचारी टस से मस नहीं हो पाया। पहली बार मे.ज. भुवन चंद्र खंडूड़ी (सेनि) की सरकार के दौरान तबादला एक्ट बनाने की कवायद शुरू हुई। इसमें तबादलों के स्पष्ट नियम और उन्हें कड़ाई से लागू करने के प्रावधान किए गए। 2012 में कांग्रेस की सरकार ने आते ही एक्ट को दरकिनार कर फिर नीति के आधार पर तबादले शुरू कर दिए।
2017 में भाजपा की सरकार बनने के बाद एक बार फिर राज्य में तबादला एक्ट की कवायद शुरू हुई। इसमें पात्र शिक्षकों को अनुरोध के आधार पर तबादलों का प्रावधान भी किया गया। इसमें दुर्गम की सेवा पूरी कर चुके, बीमार, दिव्यांग, विधवा को प्राथमिकता देने की व्यवस्था की गई। इसके बावजूद उत्तरा जैसे कई कर्मचारी हैं, जो आज भी तबादला होने की बाट जोह रहे हैं।