बृहस्पतिवार को जब मैं जेटी गांव पहुंचा तो सबसे पहले मिले 82 वर्षीय अषाढ़ सिंह ने कहा कि कुछ साल पहले उनका बेटा दयाल सिंह अकाल मृत्यु का शिकार बना। अब पोते जगदीश और राकेश के पास एक पुराना मकान था वो भी बह गया।
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थोड़ी ऊपर चढ़ने पर एक महिला मलबे के ढेर कुछ में कुछ ढूंढ रही थी। पास जाने पर पता लगा कि जहां मलबा था वहां पर विनोद सिंह नेगी का दो कमरों का मकान और गोशाला थी। गरीब विनोद ने तीन साल की मेहनत से यह मकान बनाया। और पलक झपकते ही आसमान से बरसी आफत इसे बहा ले गई। साथ ले गई भविष्य के सपने, रोजी रोटी का इंतजाम और पत्नी के कुछ जेवर। न बिस्तर बचा न तन ढ़कने के लिए कपड़े।
मलबे में अपने जेवरों और खाना बनाने के बर्तनों को ढूंढती तारा देवी से जब बात करने की कोशिश की तो फफकती हुए तारा बोली गरीबी में दिन काट रहे हैं। डेढ़ साल का एक बेटा है। बमुश्किल मकान बनाया वो भी परसों (मंगलवार) रात की बारिश में चला गया। अब कहां रहेंगे पता नहीं।
जंगल की गुफा में रात बिताई
बुधवार रात तो गांव के करीब 15 लोगों ने गांव से दो किमी दूर जंगल की गुफा में रात बिताई। जानवर बह गए। बच्ची को दूध की जगह पानी पिलाया। पति विनोद के बारे में बोलते कहा कि वो आज टेंट लेने कर्णप्रयाग गए हैं। गांव के ही अमर सिंह का मकान भी पूरी तरह जमींदोज हो गया है।
वापस आते वक्त गोद में दुधमुंहा पोता पकड़े फाल्गुनी देवी मिली। हमें प्रशासन का कर्मी समझ कर पहले तो खूब बरसी कहा कि हमारे लिए कुछ नहीं कर रही है सरकार। लेकिन जब हमने परिचय दिया तो कहा बेटा मेरा मकान टूट गया है। पुराना मकान का एक कमरा है जो कभी भी टूट सकता है। हमारी बात आगे पंहुचा दो।
खेती मलबा आने से बर्बाद हो गई
यहां विनोद, अषाढ़, अमर और फागुनी ही नहीं बल्कि हरनाथ, प्रताप सिंह, देवेंद्र सिंह और राजेंद्र लाल के मकान भी रहने लायक नहीं है। गांव के ऊपर सैकड़ों नाली सिंचित खेती मलबा आने से बर्बाद हो गई है। पेयजल लाइन और पैदल मार्ग क्षतिग्रस्त हैं। ऐसे में राहत के नाम पर प्रशासन के चेक कितनी सहायता देंगे सवाल बना है।
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