राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी प्रदीप टम्टा की शानदार जीत के साथ उत्तराखंड मुख्यमंत्री हरीश रावत के सियासी कद में भी इजाफा हुआ है।
बीते कई माह से उनको केंद्रित कर चल रहे विरोध के कई झंझावातों को नाकाम कर उन्होंने जो करिश्मा दिखाया। इससे पार्टी के अंदर-बाहर के विरोध के सुर कुछ समय के लिए तो शांत होंगे ही, पार्टी के केंद्रीय नेताओं की नजर में भी उनका मान बढ़ेगा।
मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालते ही हरीश रावत को अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा। हरीश रावत के शपथ ग्रहण के महज नौ दिन बाद ही भाजपा ने यह सोचकर अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था कि पीडीएफ की बैसाखी पर चल रहे हरीश रावत इस धक्के को संभाल नहीं पाएंगे, पर ऐसा नहीं हुआ।
इसके बाद सबसे बड़ा झटका उनकी पार्टी के नौ विधायकों ने दिया। बीती 18 मार्च को इन नौ विधायकों ने बगावत कर दी। राष्ट्रपति शासन लगने के बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर विधानसभा में हुए फ्लोर टेस्ट में वह जीतकर फिर से मुख्यमंत्री बन गए।
जब राज्यसभा सीट के लिए टिकट की चर्चा होने लगी तो हरीश रावत ने दलित कार्ड खेलते हुए प्रदीप टम्टा को टिकट दिलाया। भाजपा ने भी पर्याप्त संख्या बल नहीं होने के बावजूद गोटियां बिछा दीं। लेकिन, इस रणनीति को नाकाम साबित कर हरीश रावत ने भाजपा समर्थित उम्मीदवार गीता ठाकुर को अपने खेमे में शामिल कर लिया।
ऐन वक्त पर हुए इस बदलाव की भनक तक उन्होंने किसी को नहीं लगने दी। भाजपा के विधायक दान सिंह को भी अचानक ही अपने पक्ष में कर सभी को चौंका दिया। यह हरीश रावत का राजनीतिक कौशल ही है कि टम्टा को अपने प्रतिद्वंद्वी से छह वोटों के अंतर से शानदार जीत मिली।