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मॉरिशस व फिजी में भी होती है छठ पूजा

Fri, 08 Nov 2013 12:20 PM IST
अमर उजाला, देहरादून
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देहरादून में छठ व्रतियों ने गुरुवार शाम पूजा कर गुड़ की खीर का प्रसाद खाकर खरना मनाया। पूर्वांचल की संस्कृति से ही उत्प्रेरित यह व्रत भारत समेत, मॉरिशस, फिजी आदि देशों में भी संपूर्ण निष्ठा के साथ रखा जाता है।
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घर-घर में तैयारी
व्रत का पहला अर्घ्य शुक्रवार को दिया जाएगा। इसके लिए गुरुवार को घर-घर में तैयारी हुई। बाजार से फल, गन्ने आदि की खरीदारी की गई। बिहारी महासभा के अध्यक्ष सतेंद्र कुमार ने बताया कि शुक्रवार को शाम चार बजे से लोग पूजन के लिए टपकेश्वर पहुंचने लगेंगे।

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अर्घ्य सूर्यास्त के समय शाम पांच से साढ़े पांच के बीच दिया जाएगा। इसके लिए टैंट, लाइट और वस्त्र बदलने आदि सभी तरह की तैयारियां कर ली गई हैं। गुरुवार को बंगाली कोठी के पास ही खरने का आयोजन किया गया। सभी को खीर का प्रसाद वितरित किया गया।
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प्रचलित व्रत कथाएं
द्वापर युग में भी इस व्रत का प्रसंग मिलता है। सबसे पहले कुंती ने फिर द्रोपदी ने इस व्रत को किया था। एक मत यह भी है कि इस व्रत को नागकन्याएं करतीं थी। इस संबंध में कथा है कि कश्यप ऋषि के आश्रम में प्रतिवर्ष कार्तिक षष्ठी को नागकन्याएं सूर्य का पूजन करती थीं। एक बार संयोग से च्यवन ऋषि की पत्नी सुकन्या कार्तिक षष्ठी को कश्यप ऋषि के आश्रम में पहुंच गई।

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सुकन्या को नागकन्याओं ने बताया कि यह व्रत निरोग्यता, सुंदर काया और तेजस्वी पुत्र के लिए किया जाता है। सुकन्या ने अपने अस्वस्थ पति च्यवन ऋषि को स्वस्थ करने की मन्नत लिए यह व्रत किया।

च्यवन ऋषि का शरीर व्रत के प्रताप से निरोग्य और सुंदर हो गया। कथाएं कुछ भी हों पर सूर्य की महिमा और लोगों की भक्ति का जो मंजर छठ के अवसर पर देखने को मिलता है, वैसा और कहीं नहीं।

पूजन विधि
कार्तिक मास की चतुर्थी से यह व्रत शुरू होता है। चतुर्थी को नदी या सरोवर स्नान के बाद भोजन ग्रहण किया जाता है। इसे नहाय खाय कहते हैं। कार्तिक पंचमी को खरना होता है। दिनभर उपवास के बाद व्रती गुड़ और चावल की खीर खाती हैं। षष्ठी के दिन तो निर्जला रहकर उपासना करते हैं।

शाम होते हीं गंगा तट पहुंचते हैं और कमर तक पानी में खड़े होकर व्रती अस्तांचल सूर्य की ओर अपलक निहारते रहते हैं।

जैसे ही सूर्य की लालिमा आकाश में दिखाई देती है, वे सूर्य को अर्घ्य देने लगते हैं। सप्तमी को फिर व्रती सूर्योदय से पहले ही गंगा तट पहुंच कर पानी में खड़े हो जाते हैं। इस दिन उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देकर अपने व्रत का समापन करते हैं।
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