मां श्रीनंदा की छंतोली (राजछत्र) शुक्रवार को बनकर तैयार हो जाएगी। राज्य बनने के बाद पहली बार हो रही श्रीनंदा राजजात यात्रा सोमवार से शुरू हो रही है।
राजजात के लिए मां नंदा की छंतोली का निर्माण करीब पूरा हो चुका है। छिमटा गांव के राजरूड़िया वंशज के बिंदी लाल ने इस बार की छंतोली बनाई है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2000 की राजजात में उनके परिवार के चैतू राम ने छंतोली बनाई थी।
16 अगस्त को छंतोली को लेकर राजरूड़िया कुंवरों के गांव कांसुवा पहुंचेंगे, जबकि 17 अगस्त को कुंवर चौसिंगा खाडू के साथ छंतोली लेकर नौटी पहुंचेंगे।
सोमवार 18 अगस्त को प्रात: वैदिक पूजा-अर्चना और प्राण प्रतिष्ठा के साथ छंतोली को राजछत्र का रूप दिया जाएगा। राजजात में होमकुंड पहुंचने पर यह छंतोली विसर्जित की जाती है।
छह दिन लगते हैं छंतोली बनाने में
छंतोली बनाने में 100 से 150 रिंगाल की छड़ी लगती है। एक छंतोली की बुनाई में दो दिन और पूरी तरह से तैयार करने में छह दिन लगते हैं।
छंतोली बनाने में देव रिंगाल का प्रयोग किया जाता है, जिसे दूधातोली और भराड़ीसैंण के जंगलों से लाया जाता है। छंतोली चौकोर होती है। इसके चारों कोण दो हाथ की दूरी पर होते हैं, जो अनुमानित एक मीटर के करीब होता है।
रिंगाल की छंतोली पर चढ़ाया जाने वाला कपड़ा कांसुवा के कुंवर उपलब्ध कराते हैं। पांच मीटर सलीन का नारंगी रंग का कपड़ा छंतोली पर लगाया जाता है, जबकि करीब सवा मीटर लाल रंग के कपड़े से छंतोली के चारों किनारों को सजाया जाता है।
सात-आठ तोले का होता है मुख्य छत्र
छंतोली का मुख्य छत्र करीब 7 से 8 तोले का होता है। पं. एपी कोठियाल बताते हैं कि मां नंदा की छंतोली पर कम से कम डेढ़ तोला सोना-चांदी के जेवर चढ़ाए जाते हैं।
स्थापित होती है नंदा की सोने की मूर्ति
राजछत्र (छंतोली) में कांसुवा में कुंवर सोने की मूर्ति स्थापित करते हैं। यह प्रतीकात्मक होती है। इस मौके पर विशेष पूजा-अर्चना के साथ मूर्ति के समीप एक बटुवा भी रखा जाता है, जिसमें नंदा भक्त अपनी श्रद्धा के हिसाब से भेंट और जेवर अर्पित करते हैं।