उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में बागवानी को अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बनाने के मकसद से 1953 में चौबटिया में स्थापित उद्यान निदेशालय के अफसरों ने ही बंटाधार किया है।
उद्यान निदेशालय की कार्यप्रणाली से असंतुष्ट
कभी 400 क्विंटल सालाना सेब पैदा करने वाला चौबटिया का बगीचा इतने सालों में ऐसा बर्बाद हुआ कि आज सिर्फ चार क्विंटल सेब यहां पैदा होता है। उद्यान निदेशालय की कार्यप्रणाली से एक भी बागवान संतुष्ट नहीं है।
विदेशी सेब के लालच में इस निदेशालय में बैठने वाले नीति निर्धारकों ने बगीचे से पुराने स्वदेशी प्रजाति के सेब के पेड़ों का सफाया कर अमेरिकी सेब के पौधे लगा दिए, लेकिन इस बात का ध्यान नहीं रखा गया कि अमेरिकी सेब के लिए यहां की जलवायु कैसी है।
बागवानों को अर्थव्यवस्था की मुख्य धारा से जोड़ने का सपना बगीचे की बर्बादी के साथ ही चकनाचूर हो गया। चौबटिया में 106.91 हेक्टेअर भूमि में बगीचा और रिसर्च सेंटर स्थापित किया गया था। 53 हेक्टेअर में डेलीसिस, रॉयमर, फेनी, रेड गोल्ड, गोल्डन वैली जैसी सेब की स्वदेशी प्रजाति के पेड़ लगाए गए।
हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड में भी यहीं के रिसर्च सेंटर से सेब के पौधे जाते थे। छह साल पहले बगीचे में से स्वदेशी प्रजाति के सेब के पौधों का सफाया कर अमेरिकी रेड फ्यूजी, रेड चीफ, डे बर्न जैसी बौनी प्रजाति के पौधे लगाए गए।
बताते हैं कि अमेरिका से चौबटिया तक एक पौधा 400 रुपए में पहुंचा। कुल पांच हजार पौधे मंगाए गए और इन पौधों को 10 हेक्टेअर भूमि में लगाया गया, मगर जलवायु इस प्रजाति के अनुकूल न होने के कारण सेब का उत्पादन नहीं के बराबर हो रहा है।
पुराने बगीचे के 43 हेक्टेयर क्षेत्रफल में सब्जी और अन्य फलों के पौधे लगा दिए गए। उद्यान अधीक्षक बीएल वर्मा बताते हैं कि वर्तमान में सिर्फ 10 हेक्टेयर भूमि में ही सेब का उत्पादन हो रहा है। अफसरों की काहिली की वजह से इस बर्बादी को रोकने के लिए सरकार ने भी कोई प्रयास नहीं किए।
सीएम हरीश रावत ने हाल ही में कहा कि उद्यान की दशा सुधारने के लिए प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है, लेकिन अभी तक उद्यान के उद्धार का प्रस्ताव फाइलों में ही है। उत्तराखंड बनने के बाद यहां का रिसर्च सेंटर पंतनगर शिफ्ट हो गया था। 2012 में फिर से रिसर्च सेंटर यहां शिफ्ट किया गया, लेकिन अब रिसर्च नहीं होता, बल्कि मालियों को प्रशिक्षण दिया जाता है।
एक तरह से उद्यान निदेशालय ने शानदार बगीचे को उजाड़कर बागवानों का भविष्य गर्त में धकेलने का भी काम किया है।
बागवानों को पसंद नहीं अमेरिकी सेब
क्षेत्र के सेब उत्पादक बागवानों ने पिछले तीन सालों से उद्यान निदेशालय से अमेरिकन प्रजाति के सेब के पौधे लेने बंद कर दिए हैं। उनका कहना है कि अमेरिकन सेब के पेड़ पर कीड़ा लग जाता है।
दूसरी तरफ अमेरिकन प्रजाति का एक पेड़ चार से पांच किलो फल देता है। जबकि स्वेदशी प्रजाति के पेड़ एक बार में एक क्विंटल से अधिक फल देते हैं।
खट्टे-मीठे सेब के दीवाने थे अंग्रेज
अंग्रेज हुक्मरानों को खट्टा-मीठा सेब पसंद था। इस सेब का नाम रेड गोल्ड, गोल्डन वैली था। इसे अंग्रेज विदेशों से अपने साथ लेकर आए थे। धीरे-धीरे यह प्रजाति यहां मशहूर हुई। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी इस प्रजाति का उत्पादन होता है।