रुलक संस्था के अधिवक्ता कार्तिकेय हरी गुप्ता ने एक्ट के संबंध में अपना पक्ष रखते हुए कोर्ट में मनुस्मृति के अध्याय सात को प्रस्तुत करते हुए कहा था कि राजा खुद सर्वोपरि है वह अपने दायित्व किसी को भी सौंप सकता है। संस्था ने एटकिंशन के गजेटियर का भी उदाहरण दिया, जिसमें कहा गया कि बदरीनाथ मंदिर में करप्शन है इसलिए यहां एडमिनिस्ट्रेशन की जरूरत है।
संस्था ने मदन मोहन मालवीय द्वारा 1933 में लोगों से की गई अपील भी कोर्ट में पेश की। जिसके बाद सेक्यूलर मैनेजमेंट और रिलिजियस एक्ट 1939 में लाया गया। जिसमें सेक्यूलर मैनेजमेंट आफ टेंपल राज्य को दिया गया था जबकि रिलिजियस मैनेजमेंट मंदिर पुरोहित को दिया गया है।
संस्था ने अयोध्या मंदिर का निर्णय भी कोर्ट में पेश किया। जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि गजेटियरों को भी साक्ष्य के रूप में माना जा सकता है। जो नया एक्ट राज्य सरकार द्वारा लाया गया है, इसमें कहीं भी हिंदू धर्म की भावनाएं आहत नहीं होती हैं।
संस्था ने इस जनहित याचिका का विरोध करते हुए कहा कि चारधाम यात्रियों की सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने देवस्थानम बोर्ड बनाकर चारधाम व अन्य मंदिरों का प्रबंध लिया गया है उससे कहीं भी हिदू धर्म की भावनाएं आहत नहीं होती हैं। इसलिए सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा दायर याचिका पूरी तरह से निराधार है और याचिका निरस्त होने योग्य है। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने निर्णय को सुरक्षित रख लिया है।