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सांसद नहीं, चुनाव चिन्ह पहचानते हैं यहां के लोग

Tue, 15 Apr 2014 10:39 PM IST
चंद्रशेखर जोशी / अमर उजाला, वैला (चंपावत)
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अमर उजाला ने उन सुदूरवर्ती दुर्गम स्थानों पर जाने का प्रयास किया है, जहां संसाधन संपन्न सरकारें भी जाना पसंद नहीं करतीं। पहली रिपोर्ट में आपने दोबांस की व्यथा पढ़ी, जहां 12 किमी पैदल चलकर पहुंचा जा सका।
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सत्ता पाकर भूल जाते हैं नेताजी
दूसरी रिपोर्ट आज चंपावत जिले के वैला गांव की प्रस्तुत है जो और भी हैरान करती है। इसी उत्तराखंड में जिन्होंने इन्हीं तरह के लोगों से हो रहे अन्याय के चलते अलग पहाड़ी राज्य की मांग की, बदले में उन्हें 13 साल गुजरने पर क्या-क्या मिला।

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यह 29 किमी पैदल चलकर वैला गांव पहुंचे हमारे रिपोर्टर चंद्रशेखर जोशी की रिपोर्ट बताती है। लोकसभा चुनाव के वक्त आपके वोट से सत्ता पाकर आपको भूलने वालों को याद दिलाने का है।
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कहते हैं अमेरिका वाले करेंगे वैला का विकास
जंगल और खतरनाक रास्तों के बीच अमोड़ी से 29 किमी पैदल चलकर वैला गांव पहुंचे। यहां न बिजली थी, न ही साक्षरता का उजाला। रोड को तरसती आंखें।

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रोजमर्रा की जिंदगी को जूझते ग्रामीण लोकसभा चुनाव से बेखबर दिखे। दिल्ली से महज 400 किमी दूर वैला सबसे पिछड़े और उपेक्षित गांवों में है, हालांकि इस गांव के चार लोग अमेरिका में रहते हैं।

विकास की आवाज उठाने पर कुछ निर्लज्ज नेता ताना मारकर ये तक कह देते हैं कि वैला का विकास तो अमेरिका वाले करेंगे। 393 हेक्टेयर में फैले वैला ग्राम पंचायत की आबादी 487 है।

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चंपावत से 30 किमी सड़क से अमोड़ी पहुंचने के बाद अलग दुनिया शुरू होती है। अमोड़ी से श्री रीठा साहिब तक 45 किमी सड़क निर्माणाधीन है, लेकिन आनंदपुर खटोली तक काटे गए इस रूट में चौपहिया तो छोड़िए दोपहिया वाहन चलाना भी दुस्साहस से कम नहीं है।

न कोई लहर न कोई निशान
निर्माणाधीन मार्ग पर जाने को भी क्वैराला नदी को पार करना होता है। चंपावत विधानसभा के अंतर्गत वैला में वोटर महज 280 हैं। लोकसभा चुनाव की यहां तनिक भी आहट नहीं। न कोई लहर न कोई निशान।

पूरे गांव में हीराबल्लभ भट्ट और दो अन्यों को ही चुनावों के बारे में जानकारी है। वे कहते हैं कि वोट मांगने को भी कभी प्रत्याशी खुद नहीं आया।

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लोग कहते हैं कि उन्हें तो चुनाव के समय भी सांसद का नाम नहीं बताया जाता है, सिर्फ चुनाव का निशान बताया जाता है। ज्यादातर लोग चुनाव का मतलब पंचायत चुनाव मानते हैं।

आगे बढ़े तो स्कूल में पोलिंग बूथ को ठीक करने की तैयारी चल रही थी। बीएलओ कमल गड़कोटी ने बताया कि सेक्टर मजिस्ट्रेट बूथ का मुआयना कर चुके हैं। इन तैयारियों के बीच चुनावों को लेकर कहीं कोई उमंग नहीं।

ऊबड़खाबड़ पत्थरों वाले संकरे रास्तों से चल ग्रामीण वोट देंगे। अति दुर्गम श्रेणी के प्राइमरी स्कूल में पांच कक्षाएं, 20 छात्र और दो शिक्षक हैं। अलबत्ता नि:शुल्क पाठ्य पुस्तकें अभी नहीं मिली हैं।

बिजली नहीं होने से यहां हर रात अमावस्या की है। जगह-जगह लगे खंभे और तार पहली बार यहां पहुंचने वाले को चकमा देते हैं। मिट्टी तेल रात का सहारा है। तीन घरों में सोलर लाइट हैं।

पिछले ही माह एक गर्भवती मौत के मुंह में जाते-जाते बची। अस्पताल 63 किमी दूर चंपावत में है। वैला में न कोई जनता दरबार लगा न कभी कोई बड़ा प्रशासनिक अफसर पहुंचा। ज्यादातर लोग आठवीं से आगे पढ़े नहीं है।

यूएसए में ज्योतिषी करते हैं चार ग्रामीण
गांव के चार लोग अमेरिका में हैं। गांव के केशव मौनी बताते हैं कि यशोधर भट्ट, परमानंद मौनी ट्रेंसी में, त्रिलोचन भट्ट वाशिंगटन में और जगदीश जोशी प्रिंसबर्ग में ज्योतिषी और मंदिर में पंडिताई का काम करते हैं।

इन लोगों ने हरिद्वार में शास्त्री की पढ़ाई करने के बाद 1992 से 2004 के बीच अमेरिका की राह पकड़ी। ये एनआरआई करीब दो साल में एक बार हरिद्वार और कभी-कभार गांव भी आते हैं। परमानंद मौनी के पिता अंबादत्त अब भी गांव में रहते हैं।

67 साल में गांव पहुंचे सिर्फ चार नेता
67 साल की आजादी में महज चार नेता यहां पहुंच सके हैं। 2002 के विधानसभा चुनाव में जीत के बाद विधायक हेमेश खर्कवाल ने पहली बार यहां का रुख किया।

फिर 2008 में राज्यमंत्री बीना महराना ने दस्तक दी और आखिरी बार जनता के बीच गए चंपावत के ब्लाक प्रमुख निर्मला महराना और पूर्व जिला पंचायत सदस्य मुकेश महराना।
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