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CDS Bipin Rawat: 16 दिसंबर को युद्ध स्मारक आने का किया था वादा, अब हम याद में चंदन लगाएंगे- तरुण विजय

Fri, 10 Dec 2021 04:07 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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bipin rawat - फोटो : फाइल फोटो
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जनरल बिपिन रावत को श्रद्धांजलि देते हुए पूर्व सांसद एवं युद्ध स्मारक के अध्यक्ष तरुण विजय ने कहा कि यह युद्ध स्मारक अनेक षड्यंत्रों और क्षुद्र राजनीतिक बाधाओं को पार कर तैयार हुआ तो उसका बड़ा कारण जनरल बिपिन रावत द्वारा इसे सम्पूर्ण समर्थन देना था। वे इस युद्ध स्मारक के पिता कहे जा सकते हैं। तरुण विजय ने सीडीएस से जुड़ी यादें और अपना अनुभव साझा किया।

सैनिक सम्पदा इतिहास में अनूठा उदाहरण

तरुण विजय ने कहा कि उन्होंने इस स्मारक हेतु जमीन दिलवाई जो सैनिक सम्पदा इतिहास में अनूठा उदाहरण है। उन्होंने मिग 21 तथा नौ सेना का युद्धक पोत मॉडल दिलवाया और सेना से कारगिल विजय के ताम्र चित्र और गन्स दीं। उन्होंने 16 दिसंबर को युद्ध स्मारक के निरीक्षण का वायदा किया था, जिसके लिए हम तैयारी कर रहे थे, लेकिन अब 16 दिसंबर उनके बिना सूनी रह जाएगी। उन को यहां चंदन का पौधा लगाना था जो हम अब उनकी याद में लगाएंगे। उनका उत्तराखंड से विशेष स्नेह था, हम सदैव उनके ऋणी रहेंग।. युद्ध स्मारक संचालन मंडल की ओर  से उनको हार्दिक श्रद्धांजलि देते हैं।

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जनरल साहब हमेशा हमें मुस्कुराते हुए बहुधा मजेदार कहानियां सुनाते थे। हम हर साल सेना के लिए एक लाख राखियां देश भर के स्कूलों से बनवाकर उनको सीमावर्ती क्षेत्रों में तैनात जवानों के लिए देते थे। इस साल मैं और मेरी बेटी शाम्भवी राखियां  लेकर साउथ ब्लॉक स्थित उनके शानदार कार्यालय पहुंचे। ब्रिगेडियर लिद्दर, उनके मिलिट्री सहायक ने चाय के साथ स्वागत किया। वह इतने मिलनसार और मजाकिया थे विश्वास नहीं होता था कि उच्च सैन्य अधिकारी हैं। कितना दुख है कि वह आज नहीं रहे। कुछ देर बाद हमें जनरल बिपिन रावत के भव्य कक्ष में आमंत्रित किया गया। जनरल रावत स्वयं उठकर हमारी राखियां स्वीकार करने आए। मेरी बेटी शाम्भवी से राखी बंधवाई। फिर मेरी पत्नी से बोले 'भुली' (बहन), चाय पिए बिना जाओगी? फिर काफी देर वह मेरी बेटी से पढ़ाई और देश-विदेश की बातें करते रहे। लगा ही नहीं कि राष्ट्र के इतने महत्वपूर्ण सेनाधिपति से हम रूबरू हो रहे हैं।  

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उनको चीन के षड्यंत्रों और विश्वासघाती चालों की गहरी पहचान थी। गलवान का जो बदला उन्होंने लिया उसके कारण चीन दहल गया। चीन को कैसे भविष्य में दबा कर रखा जाए, इसकी उनकी जानकारी असीम थी और इसके लिए वे सेना के तीनों अंगों को तैयार कर रहे थे। पाकिस्तान को वह चिंता का कारण नहीं मानते थे। वह हंस कर कहते थे ' जब तय कर लेंगे निबटा देंगे' । 

उत्तराखंड में बाड़ाहोती सीमा तक सड़क नहीं थ। जनरल रावत ने स्वयं पहल कर तमाम नौकरशाही और पर्यावरण के शूल झेल कर सीमा तक बढ़िया सड़क बनवाई। यह उन्होंने मुझे स्वयं बताया था। मुंसियारी से मिलम ग्लेशियर तक की पक्की मजबूत सड़क समय पर नहीं बनाने से वह बहुत नाराज थे।

पैंतीस वर्षों से युद्ध स्मारक की मांग

देहरादून में पैंतीस वर्षों से युद्ध स्मारक की मांग हो रही थी, लेकिन एक भी मुख्यमंत्री ने एक इंच जमीन नहीं दी। बस हवाई बातें करते रहे। मनोहर पर्रिकर के समय मैंने अपनी सांसद निधि से ढाई करोड़ रुपये युद्ध स्मारक हेतु दिए तो जनरल बिपिन रावत ने थल सेनाध्यक्ष के नाते उसस्के लिए राजभवन के सामने चीड़ बाग में जमीन दी। पर्रिकर जी ने भूमि पूजन किया आज वह तैयार है। लेकिन वह इसे नहीं देख पाएंगे, इसका दुःख है। 

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इस युद्ध स्मारक निर्माण में हर बाधा को जनरल बिपिन रावत ने दूर किया। मिग 21 का फ्रेम दिलवाया, स्वयं कारगिल विजय के ताम्र चित्र  दिलवाए, नौसेना का मॉडल दिया और कहा तरुण जी मैं 16 दिसंबर को शौर्य स्थल देखने जरूर आऊंगा। लेकिन विधि का विधान कुछ और ही था। गगन में अमर नक्षत्र की भांति  जनरल बिपिन रावत सदैव भारतीय युवाओं को सैन्य धर्म पालन की प्रेरणा देते रहेंगे.

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