उत्तराखंड में बिल्डरों की जमकर मनमानी चल रही है। हाउसिंग और शापिंग के बड़े प्रोजेक्ट निर्माण से पहले पर्यावरण क्षति का आकलन नहीं कराया जा रहा है।
दुखद तो यह है कि इसकी औपचारिकताएं भी पूरी नहीं की जा रही हैं, इसको लेकर प्रदेश के सभी विकास प्राधिकरणों से लेकर उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तक की कार्यशैली पर सवाल खड़ा हो रहा है। यह तब जबकि कई शहर पर्यावरण के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं।
प्रदेश बनने के बाद से लेकर अब तक लगभग 200 ग्रुप हाउसिंग का निर्माण हो चुका है। इसमें से लगभग 50 से अधिक ऐसे ग्रुप हाउसिंग हैं, जिनका क्षेत्रफल 20 हजार वर्गमीटर से अधिक है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत ऐसे ग्रुप हाउसिंग का निर्माण पर्यावरण क्षति का आकलन कराये बिना किया ही नहीं जा सकता है। देहरादून, हरिद्वार और काशीपुर में सबसे अधिक ऐसे निर्माण किए गए हैं।
क्या हैं मानक
20 हजार वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्रफल पर अगर कोई निर्माण हो रहा है तो उस स्थिति पर्यावरण क्षति का आकलन कराना अनिवार्य होता है। आकलन के बाद ही उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से एनओसी जारी की जाती है, जिसके बाद निर्माण कार्य शुरू किया जाता है।
एमडीडीए कोई भी मानचित्र सशर्त स्वीकृत करता है। अगर किसी बिल्डर ने पर्यावरण का आकलन कराए बिना 20 हजार वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्रफल में निर्माण कर दिया है तो उसका मानचित्र खुद ही निरस्त समझा जाए।
- आर मीनाक्षी सुंदरम, वीसी एमडीडीए
सूचना मिली है कि 20 हजार वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्रफल में बिल्डरों ने बड़े पैमाने पर ग्रुप हाउसिंग का निर्माण कर दिया है। ऐसे निर्माणों की सूची सभी प्राधिकरण और मानचित्र पास करने वाली अन्य एजेंसियों से मंगाई गई है। इसकी जांच कराई जाएगी। जांच के बाद कार्रवाई होगी। जरूरत के अनुसार उन्हें कोर्ट में भी खड़ा किया जाएगा।
- विनोद सिंघल, सदस्य सचिव उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड