अनियमितताओं के सवालों पर कठघरे में खड़े इंडियन काउंसिल फॉर फारेस्ट्री रिसर्च एंड एजूकेशन (आईसीएफआरई) में संविधान और देश की सर्वोच्च अदालत का भी कोई मान नहीं रखा गया।
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दो अप्रैल को आईसीएफआरई और फारेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (एफआरआई) को भेजी कैग रिपोर्ट में साफ किया गया है कि संस्थान के अधिकारियों ने संविधान, सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट, बोर्ड आफ गवर्नेंस (बीओजी) और सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (सीएटी) के आदेशों को भी तवज्जो नहीं दी।
ये आदेश वर्ष 1999 से अब तक संस्थान के वैज्ञानिकों और कर्मचारियों के पक्ष में थे। आदेशों की अवहेलना पर कैग की रिपोर्ट में कड़ी टिप्पणी की गई है।
उच्च पदस्थ आईएफएस अधिकारियों की कार्यशैली को तानाशाही बताया गया है। कैग ने साफ किया है कि संस्थान की कार्यप्रणाली देश के संविधान और सभी न्यायालयों से भी ऊपर पाई गई है। यहां न कोई फैसला मायने रखता है और न कोई मंत्रालय का आदेश, न ही संविधान।
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ऐसे की गई अवहेलना
-12 मार्च 1999 को जबलपुर उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि वैज्ञानिकों के प्रमोशन का आधार डिपार्टमेंटल रिन्यू कमेटी (डीआरसी) की तिथि के बजाय वह तिथि होगी, जिस पर वैज्ञानिक का प्रमोशन पीरियड (ड्यू डेट) शुरू हो रहा है, लेकिन आईसीएफआरई ने कोई कार्रवाई नहीं की। -आईसीएफआरई ने ग्रुप ‘ए’ साइंटिस्ट की नियुक्ति और प्रमोशन की वर्ष 1991 में तय नियमावली को बोर्ड आफ गवर्नर्स की अनुमति के बिना बदल दिया, जिससे वैज्ञानिकों को भारी नुकसान हुआ। -पांच अक्तूबर-2010 के दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को दो मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने भी बहाल रखते हुए आदेश जारी किया कि वैज्ञानिकों के प्रमोशन की तिथि डेट ऑफ इलिजिबिलिटी ही होगी, मार्च 2014 तक संस्थान में इस आदेश का पालन नहीं हुआ है। -विधि मंत्रालय ने आदेश जारी किया था कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार वैज्ञानिकों के प्रमोशन का आधार डेट ऑफ इलिजिबिलिटी ही होगी, भले ही यह मुकदमा एक ही वैज्ञानिक ने जीता हो, आईसीएफआरई में इस आदेश को नहीं माना गया। - वर्ष 2012 में एचएफआरआई शिमला के छह वैज्ञानिकों ने सीएटी चंडीगढ़ की शिमला ब्रांच में प्रमोशन का केस जीता लेकिन आईसीएफआरई ने उन्हें प्रमोशन लाभ नहीं दिया। -वर्ष 2012 में ही आईएफजीटीबी कोयंबटूर के दस वैज्ञानिकों ने सीएटी चेन्नई में मुकदमा जीता, लेकिन आईसीएफआरई ने इन्हें भी लाभ नहीं दिया। -वर्ष 2011 में टीएफआरआई जबलपुर के आठ वैज्ञानिकों ने प्रमोशन का केस जीता, संस्थान ने सिर्फ इन वैज्ञानिकों को प्रमोशन लाभ दिया जबकि संस्थान की सभी शाखाओं में समान नियम लागू है। -वर्ष 2013 में एफआरआई और आईसीएफआरई के 51 वैज्ञानिक सीएटी दिल्ली की शरण में हैं, इनका मामला अभी तक पेंडिंग है।
यह है प्रमोशन का गणित
माना कि संस्थान में किसी वैज्ञानिक ने एक जनवरी-2000 को ज्वाइन किया है। नियमानुसार उसका प्रमोशन एक जनवरी-2003 को होना है।
इस लिहाज से डीआरसी तीन माह पूर्व यानी एक अक्तूबर 2002 को शुरू होनी चाहिए। लेकिन आईसीएफआरई में इसकी अनदेखी की गई। नियत तारीख को वैज्ञानिक को प्रमोशन देने के बजाय डीआरसी में ही तीन से पांच साल का वक्त लगाया गया।
इसके बाद जब प्रमोशन दिया गया तो एक जनवरी-2003 के बजाय डीआरसी पूर्ण होने की तारीख के आधार पर दिया गया। सभी न्यायालयों में वैज्ञानिकों ने इसे चुनौती दी और जीते भी। लेकिन संस्थान ने किसी की नहीं सुनी।
इसलिए लटकाते हैं डीआरसी वैज्ञानिकों को यदि समय पर प्रमोशन मिलता रहे तो वे संस्थान के उच्च पदों पर काबिज डेपुटेशन वाले आईएफएस अफसरों से सीनियर हो जाएंगे। इसके बाद इन अधिकारियों को कुर्सी छोड़कर जाना होगा। ऐसे में ये अधिकारी डीआरसी को लटकाए रखते हैं।
सीएजी के सवाल - क्या आईसीएफआरई देश के सर्वोच्च न्यायालय से भी ऊपर है? - यह संस्थान विधि मंत्रालय और विधिक मामलों के मंत्रालय से भी ऊपर है? - संस्थान में चलाया जा रहा संविधान, भारत के संविधान से भी ऊपर है? - ऐसे मनमाने तरीकों से क्या आईसीएफआरई वास्तव में विज्ञान व शोध को बढ़ावा दे रहा है?
अमर उजाला में आईसीएफआरई के भ्रष्टाचार, मनमानी और घोटालों के सिलसिलेवार खुलासों के बाद अब आईएफएस अधिकारियों के पसीने छूटने लगे हैं। हड़कंप इस कदर है कि दून के बाद अब दिल्ली में अधिकारियों की गोपनीय बैठक बुलाकर हालात से निपटने की रणनीति पर चर्चा की गई।
सूत्रों के मुताबिक आईसीएफआरई, एफआरआई और इससे जुड़े सभी संस्थानों के आला अधिकारियों की बैठक दिल्ली में हुई। बैठक में कैग रिपोर्ट के आधार पर अमर उजाला में प्रकाशित खबरों को खतरा बताया गया।
यह भी तय किया गया कि रिपोर्ट लीक करने वाले कर्मचारी का पता लगाना जरूरी है। इस लिहाज से संस्थानों के सभी कर्मचारियों पर पैनी निगाह भी रखी जा रही है। आश्चर्य की बात यह है कि इन मामलों पर न तो डीजी एसएस गर्ब्याल कुछ बोलने को तैयार हैं और न ही उनके मातहत।
अमर उजाला ने शुक्रवार को भी संस्थान के एडीजी कमलप्रीत से बात करने का प्रयास किया लेकिन उन्होंने फोन और मैसेज का कोई जवाब नहीं दिया। इससे अधिकारियों की नीयत पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। बता दें कि आईसीएफआरई का अतिरिक्त चार्ज एसएस गर्ब्याल के पास है, वह अधिकतर समय दिल्ली में ही रहते हैं।