उत्तराखंड की तीन विधानसभा सीटों के उपचुनाव में न तो मोदी की लहर का असर दिखा और न ही आपदा की याद ताजा हुई।
केंद्रीय नेताओं ने भी नहीं दिखाई रुचि
तीनों जगह के चुनाव व्यक्ति विशेष और स्थानीय मुद्दों तक सिमटे रहे। दोनों ही पार्टियों कांग्रेस-भाजपा के केंद्रीय नेताओं ने भी चुनाव को लेकर कोई रुचि नहीं दिखाई।
चुनाव प्रचार में भी न तो कांग्रेस और न ही भाजपा नेता आक्रामक दिखे। कोई ऐसा करिश्मा भी नहीं दिखा जो मतदाताओं को बूथ तक खींच ला पाता।
मुख्यमंत्री हरीश रावत पूरा चुनाव इलाके से दूर रहकर ही लड़ा। हालांकि परिवार के सदस्यों के साथ कांग्रेस नेताओं ने मजबूत नाकेबंदी की थी। यहां पर कांग्रेसी मुख्यमंत्री की जीत के प्रति पूरे आश्वस्त हैं।
मुख्यमंत्री की ओर इलाके में मार्मिक पोस्टर और अपील प्रकाशित की गईं। मुख्यमंत्री बीमार होने के कारण क्षेत्र में नहीं पहुंचे इसे जनता ने सकारात्कम रूप से लिया है।
डोईवाला सीट पर भाजपा व कांग्रेस दोनों ही जीत का दावा कर रहे हैं। भाजपा नेता मतदान प्रतिशत अच्छा होने को अपने पक्ष में देख रहे हैं और कांग्रेसियों का दावा है कि यह मतदान कांग्रेस के गढ़ जैसे मार्खम ग्रांट, माजरी आदि में ज्यादा हुआ, इसलिए कांग्रेस प्रत्याशी को लाभ मिलेगा।
कांग्रेस की ओर मंत्री इंदिरा हृदयेश की रणनीति आखिर समय में काम करती दिखी जिसने अंतिम समय में कांग्रेस की गुटबाजी पर अंकुश लगाया। डोईवाला सीट तीनों में सबसे ज्यादा हॉट हो गई थी।
विरोध और गुटबाजी का सामना करना पड़ा
भाजपा प्रत्याशी त्रिवेंद्र सिंह रावत को अपनी ही पार्टी में भारी विरोध और गुटबाजी का सामना करना पड़ा है। उधर, सोमेश्वर में भी कुछ इसी तरह की स्थिति है।
यहां पर कांग्रेस की रेखा आर्य व भाजपा के मोहनराम आर्य में मुकाबला हुआ। लेकिन कम मत प्रतिशत होने से भाजपाइयों के होश उड़े हुए हैं। और, कांग्रेसी इसे अपने लिए लाभ के रूप में देख रहे हैं।
अगर रेखा आर्य को कांग्रेस के कुछ नाराज नेताओ ने स्वीकार कर लिया होगा तो उनके जीतने के कारण बढ़ जाएंगे।
कांग्रेस-भाजपा मतदान प्रतिशत को भले ही अपने-अपने तरीके से ले रहे हों लेकिन 25 जुलाई को मतदाताओं का फैसला प्रदेश में राजनीति की नई तस्वीर बनाएगा।
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