बजट घोषणाओं में वेतनभोगी वर्ग खासा निराशा हुआ है। वित्त मंत्री ने करमुक्त आय की सीमा में मामूली बढ़ोत्तरी करते हुए उसे तीन लाख कर दिया है।
वहीं तीन से पांच लाख तक की आय दर्शाने वालों को दस के बजाए पांच फीसदी की दर से कर देना होगा, जबकि पांच लाख से दस लाख तक के स्लैब में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इसके अलावा करदाताओं की संख्या बढ़ाने के लिए भी कोई खास जतन बजट में देखने को नहीं मिला।
वित्त मंत्री ने बजट भाषण के दौरान इस तथ्य का उल्लेख किया है कि देश भर में 76 लाख लोग ऐसे हैं, जो पांच से दस लाख रुपए आय दिखाते हुए रिटर्न भरते हैं। इसमें भी 56 लाख लोग ऐसे हैं, जो वेतनभोगी वर्ग से ताल्लुख रखते हैं। हैरानी की बात यह है कि इस बजट में टैक्स स्लैब के घटने-बढ़ने से उन्हें कोई लाभ नहीं होगा।
आयकर सलाहकारों की मानें तो जब वित्त मंत्री खुद इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि देश की एक फीसदी आबादी ही रिटर्न दाखिल कर रही है। इनमें सर्वाधिक करदाता वेतनभोगी वर्ग से जुड़े हैं। सातवां वेतन आयोग लागू होने के बाद समूह-ग तक के कर्मचारी की सालाना आय पांच लाख से अधिक हो गई है। यदि वे अपना रिटर्न दाखिल करके टैक्स भर रहे हैं तो उन्हें प्रोत्साहित करने की आवश्यकता थी।
बजट में यह प्रावधान भी किया गया है कि पहली बार रिटर्न दाखिल करने वाले ऐसे करदाताओं को केवल एक पेज का रिटर्न भरना होगा, जिसकी सालाना आय पांच लाख है। हालांकि इसमें व्यवसाय से हुई आय को इसमें नहीं जोड़ा गया हो। इन्हें यह सहूलियत भी मिलेगी कि इनके केस की तब तक स्क्रूटनी नहीं होगी, जब तक कोई विशिष्ट सूचना आयकर विभाग के पास न हो। इसके अलावा वित्त मंत्रालय ने करदाताओं की संख्या बढ़ाने के लिए कोई खास प्रस्ताव तैयार नहीं किया है।
सरकार को अच्छे से पता है कि 125 करोड़ की आबादी वाले इस देश में मात्र एक फीसदी के करीब व्यक्ति ही कर देता है, जिसमें वेतनभोगी वर्ग बहुतायत है। ऐसे में उन्हें प्रोत्साहित करने की आवश्यकता थी। वहीं ज्यादा से ज्यादा लोग रिटर्न फाइल करें इसके लिए कोई प्रयास बजट में नजर नहीं आया।
- सीए विवेक खन्ना, (वरिष्ठ आयकर सलाहकार)