भारत रत्न डॉ. गोविंद बल्लभ पंत ने न केवल राजनैतिक तरीकों से, बल्कि लेखन के जरिए भी आजादी की मुहिम में शामिल होने के लिए लोगों को प्रेरित किया।
जाने-माने इतिहासकार डॉ. अजय रावत बताते हैं कि उनकी किताब ‘फॉरेस्ट प्रॉब्लम इन कुमाऊं’ से अंग्रेज इतने भयभीत हो गए थे कि उस पर प्रतिबंध लगा दिया था। बाद में इस किताब को 1980 में पुन: प्रकाशित किया गया।
कुमाऊं में अंग्रेजों के शासन से पहले गोरखाओं का शासन था, उनका प्रशासन और न्याय करने का तरीका बेहद क्रूर था। जब 1815 को अंग्रेजों का शासन कुमाऊं में शुरू हुआ, तो उन्होंने कई सामाजिक हित से जुड़े कार्य और व्यवस्थित तंत्र विकसित किए। डॉ. अजय रावत बताते हैं कि इसके चलते देश के अन्य हिस्सों की तुलना में यहां पर अंग्रेजों के प्रति नाराजगी कम थी।
ऐसे में लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ तैयार करने के लिए गोविंद बल्लभ पंत ने कमान संभाली। 1916 में कुमाऊं परिषद का गठन किया गया। इसके सांगठनिक सचिव पंत जी ही थे। अंग्रेजों ने फारेस्ट एक्ट बनाने के साथ ही आरक्षित, संरक्षित वन घोषित कर दिया।
पहाड़ के लोग वनों पर ही आश्रित थे, ऐसे में उनके हक-हकूक प्रभावित हो रहे थे। 1920 में जनता ने असहयोग आंदोलन के समय जंगलों में आग भी लगा दी थी। वनाधिकार कानून आदि से लोगों को किस तरह की परेशानी हो रही थी, इस पर गोविंद बल्लभ पंत ने 1922 में ‘फॉरेस्ट प्रॉब्लम इन कुमाऊं’ किताब लिखी।
यह किताब नैनीताल के ज्ञानोदय प्रकाशन से छापी गई। यह पुस्तक वन और पानी के अधिकार पर फोकस थी। डॉ. रावत का दावा है कि इस किताब से जनता में असंतोष बढ़ने का डर था, इसलिए अंग्रेजों ने उस किताब को बैन करने का फैसला किया। बाद में डा. रावत ने 1980 में ‘फारेस्ट प्रॉब्लम इन कुमाऊं’ का पुन: प्रकाशित कराया।