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कांग्रेस टूटी पर हरदा का चक्रव्यूह नहीं भेद पाई भाजपा

Wed, 01 Jun 2016 11:05 AM IST
अरुणेश पठानिया/अमर उजाला, देहरादून

सार

  • दो बरस में कई बार कांग्रेस में सेंधमारी का नहीं मिला सियासी लाभ
  • कांग्रेस नेताओं के आने से कुनबा तो बढ़ा पर फ्लोर पर ताकत नहीं
  • राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा का पैंतरा किया इस्तेमाल
  • पीडीएफ और कांग्रेस में रोष की हाईवोल्टेज ड्रामे में उलझी भाजपा
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हरीश रावत - फोटो : पीटीआई
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विस्तार
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विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस के हाथों भाजपा को दो माह में दूसरी बार रणनीतिक हार का सामना करना पड़ा है। सीएम हरीश रावत के सियासी चक्रव्यूह को भेदने में भाजपा एक बार फिर नाकाम साबित हुई है। सत्ता की लड़ाई में भाजपा ने कांग्रेस में कई बार तोड़फोड़ कर अपना कुनबा तो बढ़ा लिया लेकिन ‘सत्ता’ को नुकसान नहीं पहुंचा पाई।
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वहीं अब राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस में कुमाऊं को मिली तरजीह से पनप रहे असंतोष की काट भाजपा के पास नहीं है, जबकि गढ़वाल से कई बड़े चेहरे उनके साथ हैं। लगातार दो वर्ष से कांग्रेस में चल रही सेंधमारी के बाद भी भाजपा रणनीतिक फ्रंट पर जिस तरह मात खा रही है उससे पार्टी की विधानसभा चुनाव में चुनौती और बढ़ गई है।

पूर्व सांसद सतपाल महाराज की भाजपा में एंट्री से शुरू हुई कांग्रेस की टूट से भाजपा को फिलहाल फ्लोर पर सियायी लाभ मिलता नहीं दिख रहा। भाजपा में शामिल होने के बाद महाराज का सियासी इस्तेमाल भाजपा ने प्रदेश की राजनीति में नहीं किया।
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महाराज के भाजपा आने के बाद सीएम हरीश रावत का हुआ पहला फ्लोर टेस्ट कांग्रेस के पक्ष में रहा था। महाराज के करीबियों के साथ कमजोर कड़ी माने जाने वाले प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट (पीडीएफ) तक में सेंधमारी की रणनीति में भाजपा फेल साबित हुई थी।
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एक बार नहीं कई बार भाजपा ने खाई शिकस्त

सीबीआई मुख्यालय के बाहर हरीश रावत - फोटो : पीटीआई
इसके तुरंत बाद लोकसभा चुनावों के चलते तीन विधानसभाओं के उपचुनाव में भाजपा चारों खाने चित हुई। भाजपा का सबसे बड़ा प्रयास 18 मार्च को हुआ जब कांग्रेस के नौ विधायक जिसमें एक पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, एक कैबिनेट मंत्री हरक सिंह सहित सात विधायक भाजपा कैंप में आ गए। भाजपा इसे बड़ी जीत मान कर अपनी सरकार बनाने की तैयारी में जुट गई। केंद्र से कैलाश विजयवर्गीय सहित भाजपा के तमाम दिग्गज मैनेजर राजधानी में कैंप लगाए रहे, लेकिन सरकार बनाने की अनुकूल परिस्थितियां 10 मई को फिर कांग्रेस के पक्ष में रही।

हालांकि इस दौरान भी भाजपा ने कांग्रेस से एक और विधायक रेखा आर्य को अपने पाले में कर सदन में अपना संख्या बल सर्वाधिक कर लिया। अब राज्यसभा नामांकन से ठीक पहले जब तक भाजपा कोई कदम उठाती कांग्रेस ने उसी का तोड़फोड़ पैंतरा इस्तेमाल किया। सीएम हरीश रावत के लिए एक बार फिर पीडीएफ कारगर साबित हुआ। पीडीएफ में टूट की आस के साथ कांग्रेस में टिकट को लेकर मचे घमासान को भाजपा के रणनीतिकार समझ नहीं पाए।

कांग्रेस का राज्यसभा नामांकन से पहले चला हाई वोल्टेज सियासी ड्रामा सीएम हरीश रावत को कमजोर दिखाने में कामयाब रहा, जिससे भाजपा आखिरी मौके तक चुनाव को लेकर अपनी गोटियां नहीं बैठा पाई। भाजपा अपने कुनबे को कांग्रेस के दिग्गजों से बढ़ा रही है, लेकिन उनका इस्तेमाल सियासी मैदान पर अभी तक कारगर ढंग से नहीं कर पाई है। कांग्रेस का कामयाब फ्लोर मैनेजमेंट और भाजपा की रणनीतिक कमजोरी का असर विधानसभा चुनाव पर भी पड़ सकता है।
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