बाहर कमाल, घर में बेहाल...। उत्तराखंड के जैविक उत्पादों की कुछ यही स्थिति है। इन उत्पादों का 80 फीसदी आस्ट्रेलिया, जर्मनी, दुबई सहित अन्य देशों में निर्यात होता है, बाकी 20 प्रतिशत की सप्लाई देश में है।
अपने प्रदेश की बात करें तो इनकी बिक्री केवल राजधानी दून तक ही सीमित है।वह भी चावल और सब्जियों की। उत्तराखंड जैविक उत्पाद परिषद लोगों को इन उत्पादों की तरफ खींचने के लिए अब हाट का सहारा ले रही है। गए गुरुवार ही पहली हाट लगी है।
हर्षिल का राजमा, सल्ट की मिर्च हाट
देश की बात करें तो अपने उत्तराखंड के जैविक उत्पादों की सबसे ज्यादा पूछ दिल्ली, चंडीगढ़, मध्य प्रदेश, बंगलूरू, कोलकाता में है। खास तौर पर चौलाई, सोयाबीन, राजमा, मिर्च वहां सबसे ज्यादा जा रहा है।
चकराता और हर्षिल (उत्तरकाशी) का राजमा, जबकि सल्ट (अल्मोड़ा) की मिर्च ज्यादा मांग में है। देश में उत्पादों की कुल खपत 600-700 टन है, जिनमें चावल 100 टन के आस-पास खपते हैं।
बाहरी देशों में निर्यात की स्थिति
चावल (देहरादून बासमती, पूसा-11, पूसा-21) 4000 टन
जायगिरी-400 टन
मसाले (लाल मिर्च, हल्दी, धनिया)-100 टन
एक घंटे में 600 किलो सब्जियां साफ...
प्रदेश भर से उत्तराखंड जैविक उत्पाद परिषद से तकरीबन 22 हजार किसान जुड़े हैं। अकेले दून की बात करें तो यहां हर रविवार सर्वे चौक स्थित केंद्र पर जैविक उत्पादों, सब्जियों का स्टाल लगाया जा रहा है।
परिषद के अधिकारियों की मानें तो सब्जियों की मांग इतनी है कि पूरी नहीं हो पा रही। लोग केंद्र खुलने से पहले पहुंच जाते हैं। एक घंटे के भीतर 600 किलो सब्जी उठ जाती है। यहां चावल की खपत 10 टन के आस-पास, जबकि दालों की 2-3 टन के करीब है।
अपने जैविक उत्पादों की देश में मांग कम होने की वजह लोगों में इन उत्पादों के प्रति जागरूकता की कमी और क्रम क्षमता कम होना है। परिषद लोगों को जागरूक करने के लिए कदम उठा रही है।
- पंकज कुमार, उत्पाद विकास अधिकारी, उत्तराखंड जैविक उत्पाद परिषद