बायोपायरेसी को नियंत्रित करने में सहायता मिलेगी
प्रो. रावत ने बताया कि कोविड-19 के बाद हर्बल उत्पादों की मांग में तेजी से वृद्धि हुई है। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड के पारंपरिक पुष्प एवं जड़ी-बूटियां दुर्लभ और औषधीय गुणों से भरपूर हैं, जो अभी भी व्यापक रूप से उपयोग में नहीं आ पाई हैं। प्रस्तुतिकरण में वैज्ञानिक प्रामाणिकता और डीएनए बारकोडिंग तकनीक के बारे में बताया गया, जिससे जड़ी-बूटियों की प्रामाणिकता सुनिश्चित करने, मिलावट को रोकने और जैव चोरी (बायोपायरेसी) को नियंत्रित करने में सहायता मिलेगी।
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उत्तराखंड में नए अवसर तैयार करेगी यह चाय
राज्यपाल ने शोध की सराहना करते हुए कहा कि यह उत्तराखंड की समृद्ध औषधीय परंपरा को वैज्ञानिक आधार प्रदान करेगी। सतत विकास को बढ़ावा देगी। उन्होंने कहा कि इस अध्ययन का लाभ स्थानीय समुदायों तक पहुंचना चाहिए। जिससे किसानों और उद्यमियों को आर्थिकी बढ़ाने के अवसर मिल सकें। उन्होंने राज्य की औषधीय जड़ी-बूटियों को वैश्विक पहचान दिलाने और वैज्ञानिक अनुसंधान को व्यावसायिक रूप देने के लिए संस्थानों, वैज्ञानिकों और उद्यमियों के समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया। राज्यपाल ने कहा कि इस शोध से राज्य के युवाओं को जैव प्रौद्योगिकी और हर्बल उत्पाद से विकास के क्षेत्र में नए अवसर मिलेंगे। इस अवसर पर अपर सचिव स्वाति एस भदौरिया, जैव प्रौद्योगिकी विभाग कुमाऊं विवि के विभागाध्यक्ष प्रो. संतोष के उपाध्याय उपस्थित रहे।