देवीधुरा के खोलीखांड दूबाचौड़ा मैदान में शनिवार को साफ मौसम के बीच अपराह्न 1.59 बजे शंखध्वनि के साथ ऐतिहासिक बग्वाल (पत्थर युद्ध) का श्रीगणेश हुआ। मंदिर के पुजारी ने 7 मिनट बाद बग्वाल बंद करने को कहा, लेकिन इसके बाद भी 3 मिनट तक जारी रहने से कुल 10 मिनट तक बग्वाल चली।
जाली से सीएम ने देखी बग्वाल
एक लाख से अधिक लोग इस रोमांच भरे नजारे के साक्षी बने। पहली बार मुख्यमंत्री के रूप में हरीश रावत ने भी बग्वाल देखी। अलबत्ता दर्शक दीर्घा में बैठे सीएम की सुरक्षा के मद्देनजर जाली लगाई गई थी। बग्वाल में 124 बग्वाली वीर सहित कुल 149 लोग जख्मी हुए।
सबसे पहले वालिक खाम के बग्वाली वीरों ने रणक्षेत्र में प्रवेश किया। उसके बाद लमगड़िया खाम, फिर चम्याल खाम और आखिर में गहड़वाल खाम के बग्वाली वीरों ने दस्तक दी। मां व्रज बाराही के मंदिर की परिक्रमा करने के बाद चारों खामों के वीरों ने अपना-अपना मोर्चा संभाला।
गहड़वाल खाम की ओर से पहले फल-फूलों तथा बाद में पत्थरों की मार शुरू की गई। तो दूसरी ओर से भी जवाब में फल और पत्थर चले। लमगड़िया खाम का नेतृत्व वीरेंद्र लमगड़िया, चम्याल खाम का गंगा सिंह चम्याल, गहड़वाल खाम का वयोवृद्ध त्रिलोक सिंह बिष्ट और वालिक खाम का नेतृत्व बद्री सिंह बिष्ट ने किया।
पुजारी के रोकने के 3 मिनट तक चलता रहा युद्ध
मंदिर के पीत वस्त्रधारी पुजारी धर्मानंद ने 2.07 बजे रणक्षेत्र में पहुंचकर चंवर झूलाकर बग्वाल समाप्त होने का संकेत किया, लेकिन उनके इस संकेत के बाद भी बग्वाल अगले तीन मिनट तक चलती रही। अंतत: 2.10 बजे बग्वाल पर विराम लगा।
चारों खामों के लोगों ने आपस में गले-मिल कुशलक्षेम पूछी। मां बाराही के दरबार में मत्था टेका। इस बार बग्वाल पिछले साल से चार मिनट कम चली। पिछले वर्ष बग्वाल 14 मिनट तक चली थी।
बग्वाल का आंखों देखा हाल पीठाचार्य कीर्ति शास्त्री और संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य बीसी जोशी ने सुनाया। जन सैलाब के चलते लोग मां बाराही मंदिर की गुंबद में चढ़कर भी बग्वाल का नजारा देखते रहे।
खोलीखांड दूबाचौड़ के आसपास के मकानों की छतें दर्शकों से खचाखच भरी थीं। मंदिर कमेटी के संस्थापक अध्यक्ष लक्ष्मण सिंह लमगड़िया एवं जिला पंचायत अध्यक्ष खुशाल सिंह अधिकारी ने दावा किया कि करीब एक लाख से अधिक लोग बग्वाल के साक्षी बने।
एक आदमी बराबर खून निकलने के बाद होती है बंद
बग्वाल यानी पत्थर युद्ध, लेकिन अदालत के आदेश के बाद बीते दो वर्षो से बग्वाल में पत्थर के बजाय फल-फूल की बौछार होती रही है। बग्वाल में चार खाम (चम्याल, वालिक, गहरवाल और लमगड़िया) हिस्सा लेते हैं।
बग्वाल में एक व्यक्ति के रक्त के बराबर खून निकलने के बाद ही बग्वाल बंद की जाती है। इसका भान होते ही मां बाराही धाम के मंदिर के पुजारी बग्वाल रोकने का आदेश देते हैं।
मान्यता के मुताबिक चम्याल खाम की एक बुजुर्ग की तपस्या से प्रसन्न हो मां बाराही देवी ने महिला को आशीर्वाद दिया। जिसके बाद नर बलि बंद हो गई और बग्वाल शुरू हुई। बग्वाल की शुरुआत कब से हुई है, इसकी तिथि का प्रमाण नहीं मिलते हैं। अलबत्ता करीब तीसरी सदी से बग्वाल देवीधुरा में हो रही है।