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बदरीनाथ रावल के 'ब्रह्मचर्य' पर छिड़ी बहस

Sat, 08 Feb 2014 03:27 PM IST
अमर उजाला, देहरादून
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धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं और मंदिर समिति के नियमों के मुताबिक रावल के पद पर आसीन होने के लिए ब्रह्मचर्य पहली शर्त है। इस नियम के तहत बदरीनाथ के रावल जब तक पूजा-अर्चना करेंगे वह ब्रह्मचारी ही रहेंगे।
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ब्रह्मचर्य का पालन न करने पर या कदाचार का आरोप लगने पर उन्हें पद छोड़ना होगा।

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बदरीनाथ में 1939 की इस व्यवस्था को कुछ प्रतिष्ठित संत, स्वामी आज भी पालन योग्य मानते हैं तो कुछ पुराने समय में ऋषि, महर्षि तक के गृहस्थ होने के आधार बताते हुए इसमें बदलाव की जरूरत महसूस करते हैं।

इसल‌िए होते हैं रावल ब्रह्मचारी: महंत ‌हरिगिरी

श्री महंत हरिगिरी का कहना है कि बदरीनाथ में ब्रह्मचारी व्यवस्था जगद्गुरु शंकराचार्य की स्थापित की हुई है। वह चाहते थे कि संपूर्ण देश एक रहे, इसलिए उत्तर के व्यक्ति को दक्षिण में, जबकि दक्षिण के व्यक्ति को उत्तर में पूजा के लिए रखा।

उस समय का चिंतन यह था कि एक गृहस्थ व्यक्ति को निवास के लिए बड़े स्थान की आवश्यकता होगी। उसका कुनबा बढ़ेगा। उसे धन की आवश्यकता होगी, इससे उसके मन में धन के प्रति कभी न कभी लालच जाग सकता है, जबकि ब्रह्मचारी धन, पद, कुनबे के लोभ से मुक्त रहेगा।

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इस प्रकरण या इक्का-दुक्का प्रकरणों को छोड़ दें तो रावल पद से जुड़ा कोई विवाद सामने नहीं आया। इसलिए इस परंपरा को सफल कहा जा सकता है। आज का चिंतन निश्चित रूप से अलग हो सकता है, लेकिन मुझे इसकी आवश्यकता नहीं लगती।

शुद्धता के साथ हो आध‌ुनिक चिंतन का समावेश

बदरीनाथ में रावल पद पर नियुक्ति के लिए ब्रह्मचर्य पहली शर्त है। यह परंपरा अनेक सालों से चली आ रही है। परंपरा की शुद्धता बरकरार रहनी चाहिए, लेकिन आधुनिक चिंतन का समावेश भी उसमें होना चाहिए।

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यह सच है कि एक प्रकरण में रावल के निलंबित होने के पश्चात गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर चुके पूर्व रावल का तिल पात्र कराकर उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई।

ऋषि, महर्षि भी गृहस्थ आश्रम में रहते हुए तप, त्यागरत रहे हैं। यह परंपरा भी देश में सदियों से रही है। गृहस्थ के रावल के रूप में पूजन-अर्चन के संबंध में पुर्नविचार की आवश्यकता है। जो भी परंपरा बने, बस वह शुद्ध होनी चाहिए।
-श्री महंत रामानंद पुरी के विचार

पहले भी रह चुके हैं गृहस्थ रावल

सांसारिक जीवन के साथ ही मठ-मंदिरों की पूजा-अर्चना कराई जा सकती है। कालीमठ के वर्ती बाबा मां जगदंबा के उपासक थे। उन्हें गृहस्थ आश्रम में रहकर मां जगदंबा के साक्षात दर्शन हुए थे। डिम्मर गांव के गोपाल डिमरी ने अस्सी के दशक में तत्कालीन रावल के मंदिर समिति से मतभेद होने पर बदरीनाथ धाम की पूजा-अर्चना का जिम्मा संभाला था। वे भी गृहस्थ थे।
-अनुसूया प्रसाद भट्ट, पूर्व बीकेटीसी अध्यक्ष।

गृहस्थ आश्रम वाला आचार्य ब्राह्मण भी धाम में निर्विघ्न पूजा करा सकता है। धाम में रावल व्यवस्था शंकराचार्य कालीन है। तब से डिम्मरी समुदाय के ब्राह्मण भी बदरीनाथ की पूजा में छह माह तक अपना योगदान देते हैं। ये ब्राह्मण सांसारिक जीवन से जुडे़ हैं।
-परमानंद भट्ट, कालीमठ तीर्थ पुरोहित।

इन्हें है आप‌त्ति
रावल के पद की गरिमा बहुत बड़ी है। इसलिए इस पद के लिए ब्रह्मचर्य का पालन जरूरी है। रावल के पद पर लंबे समय तक किसी एक की तैनाती करने के बजाय समय सीमा तय की जानी चाहिए।
-शिवानंद गिरि जी महाराज, गढ़वाल महंत की पदवी से विभूषित और कोटेश्वर महादेव मंदिर के महंत।

रावल का पद अति गरिमामय है। इसलिए इस पद के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना जरूरी है। गृहस्थ व्यक्ति इस पद को धारण नहीं कर सकता है।
-शशिधर लिंग, मुख्य पुजारी विश्वनाथ मंदिर गुप्तकाशी।

बदरीनाथ में बढ़ रहा है व्यावसायीकरण

बदरीनाथ धाम में तेजी से व्यावसायीकरण भी बढ़ा है। बाहरी क्षेत्रों से बडे़ पैमाने पर उद्योगपतियों और अन्य कारोबारियों ने यहां जमीन की खरीद कर आलीशान होटलों का निर्माण किया है।

धाम में वर्तमान में करीब 10 हजार लोगों के ठहरने की लग्जरी व्यवस्था है। एक दशक पहले यहां बमुश्किल करीब चार हजार तीर्थयात्रियों के ठहरने की व्यवस्था हो पाती थी।

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वर्ष 2003 के बाद तेजी से धाम में भवन निर्माण कार्य हुए। उद्योगपति अनिल अंबानी का भी यहां करीब 15 नाली भूमि पर आवासीय भवन है। धाम में कुछ क्षेत्र विशेष के लोगों ने धर्मशालाएं भी बनाई हैं।

साधु-संतों की भी आलीशान धर्मशालाएं

बदरीनाथ धाम में कई साधु-संतों ने भी आलीशान धर्मशालाएं बनाई हैं। यहां यात्राकाल में सत्संग, भंडारे और श्रद्धालुओं को ठहरने की व्यवस्था की जाती है।

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देव दर्शनी से बदरीनाथ बाजार तक बनी इस धर्मशालाओं में ठहरने के एवज में श्रद्धालुओं से किराया तो नहीं लिया जाता है, लेकिन चढ़ावे के रूप में लाखों की आमदनी की जाती है।

बदरीनाथ में व्यावसायिक भवनों की स्थिति
होटल - 50लॉज - 100धर्मशाला - 27यात्रा निवास - 23
बदरीनाथ में मास्टर प्लान के विपरीत हो रहे 47 निर्माण कार्यों के बीते वर्ष चालान किए गए। धाम में निर्माण कार्यों पर पूर्ण प्रतिबंध है। यात्राकाल में इस पर पैनी नजर रखी जाएगी।
-एपी वाजपेई, एसडीएम, जोशीमठ।
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निगरानी समिति बनाने की उठी मांग

रावल के बारे में उठे विवाद के बीच विश्व हिंदू परिषद ने कहा है कि धर्म और संस्कृति बचाने के लिए और मंदिर समिति के काम-काज पर निगरानी रखने के लिए अलग से एक निगरानी समिति गठित होनी चाहिए।

शुक्रवार को चंबा में विहिप की बैठक में वक्ताओं ने कहा कि बदरीनाथ और केदारनाथ में पवित्रता और सात्विकता का ध्यान नहीं रखा जा रहा है। भगवान की पूजा के लिए मनमानी से नियम बनाए जा रहे हैं। इन धामों में करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी है। ये दूषित हो जाएंगे तो ऐसे में लोग कहां जाएंगे।

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विहिप के विभाग संयोजक तिलकराम चमोली ने कहा कि धर्म का व्यावसायीकरण नहीं होना चाहिए। जिन लोगों को धार्मिक परंपराओं, देवस्थलों की शुचिता का ज्ञान नहीं है, उन्हें उत्तरदायित्व नहीं दिया जाना चाहिए।
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