उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में गुरुवार को तड़के बर्फीला तूफान आया जिससे कई स्थानों पर तबाही हुई।
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कई घरों की छतें उड़ गईं, कई पेड़ और पोल उखड़ गए। कई स्थानों पर बिजली गुल हो गई। इलाके के लोग दहशत में रहे। गनीमत यह रही कि राज्य में कोई जनहानि नहीं हुई। शासन ने तूफान प्रभावित क्षेत्रों के लिए मदद के लिए टीमें भेजी हैं।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने चार जनवरी को उच्च हिमालयी क्षेत्र में बर्फीला तूफान आने का अलर्ट सभी जिलाधिकारियों को जारी किया था। तब ऐसी कोई आपदा नहीं आई, अब चार दिन बाद बर्फीला तूफान आया। गढ़वाल में चमोली की निजमुला घाटी में बर्फीली आंधी और उत्तरकाशी के टकनौर क्षेत्र में आंधी ने कई घरों की छतें उड़ा दीं।
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उधर, कुमाऊं के पिथौरागढ़ जिले मुनस्यारी और धारचूला तहसील में तेज अंधड़ से कई मकानों की छतें और खड़े पेड़ जड़ से उखड़ गए। अचानक आई इस प्राकृतिक आपदा से लोग भारी दहशत में हैं। तूफान का सबसे ज्यादा असर मुनस्यारी के कुलथम, पापड़ी, सेरासुरईधार और धारचूला के जिप्ती क्षेत्र में रहा।
मौसम विभाग ने फिर किया इंकार
मौसम विभाग ने उच्च हिमालयी क्षेत्रों में आए बर्फीले तूफान के बारे में किसी प्रकार की जानकारी से इंकार किया है। विभाग के निदेशक डा. आनंद शर्मा ने कहा कि उनके पास बर्फीले तूफान की कोई सूचना नहीं है।
प्रभावितों को तत्काल मिलेगी मदद : अग्रवाल
पिथौरागढ़ जिले के प्रभारी मंत्री दिनेश अग्रवाल ने कहा है कि बर्फीले तूफान से प्रभावित लोगों को तत्काल सहायता दी जाएगी। जिलाधिकारी को निर्देश दिए गए हैं कि यदि किसी परिवार के साथ कोई दिक्कत हो तो उसे शीघ्र मदद दी जाए।
ग्रामीणों ने पेड़ों और गुफाओं में ली शरण
उत्तराखंड के चमोली जिले की सबसे दूरस्थ निजमुला घाटी के गांवों में बर्फीले तूफान ने कहर मचा दिया। यहां पाणा, ईराणी, भनाली, बौंणा और झींझी गांवों में बर्फीले तूफान से करीब 115 आवासीय भवनों की छतें उड़ गई हैं।
जिससे घाटी में जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। सहमे ग्रामीणों ने पेड़ों और प्राकृतिक गुफाओं में शरण लेकर अपनी जान बचाई। घाटी में रात्रि बुधवार रात दो बजे से ही ग्रामीणों में अफरा-तफरी का माहौल बना हुआ है।
क्षेत्र में बुधवार रात से बर्फीला तूफान शुरू हुआ जो लगातार गुरुवार को सुबह 11 बजे तक चलता रहा। प्रशासन ने ग्रामीणों की सूचना पर आपदा और तहसील प्रशासन की दो टीमें सेटेलाइट फोन के साथ प्रभावित गांवों के लिए रवाना कर दी गई हैं।
अपर जिलाधिकारी एमएस बिष्ट ने बताया कि तूफान से कोई जनहानि की सूचना नहीं है। प्रशासन ने टीम के साथ बीस कंबल और बीस तिरपाल भी भेजे हैं। टीम देर रात्रि तक ही प्रभावित क्षेत्र में पहुंचेगी।
विषम भौगोलिक परिस्थितियों की घाटी
जिले की निजमुला घाटी विषम भौगोलिक परिस्थितियों की घाटी है। घाटी के ग्रामीणों को अपने गांवों तक जाने के लिए आज भी करीब 10 किमी की पैदल दूरी तय करनी पड़ती है।
क्षेत्र में संचार और स्वास्थ्य सुविधा नहीं है, जिससे यहां होने वाली कोई भी घटना की तत्काल जानकारी नहीं मिल पाती है। ताजा घटनाक्रम के मुताबिक ईराणी गांव के ग्रामीण महिपाल सिंह ने तूफान के दौरान ही गांव से चार किमी दूर आकर एक पहाड़ी से डब्ल्यूएलएल फोन से सुबह साढे़ नौ बजे गोपेश्वर में अपने ही गांव के मोहन सिंह नेगी को तूफान की सूचना दी।
उन्होंने तत्काल क्षेत्र के अन्य ग्रामीणों के साथ ही जिला प्रशासन व जिला आपदा प्रबंधन विभाग को इसकी सूचना दी। जिसके बाद प्रशासन ने नायब तहसीलदार सुशीला कोठियाल के साथ ही आपदा प्रबंधन के छह कर्मचारी प्रभावित गांवों के लिए रवाना हुए।
खानापूर्ति तक सिमटा रहा एनडीआरएफ का अलर्ट राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण भारत सरकार ने बीती 4 व 5 जनवरी को चमोली जिले में हिमस्खलन का अलर्ट जारी किया था। जिसके बाद जिला प्रशासन ने इस अलर्ट को सिर्फ खानापूर्ति तक सीमित रखा।
अलर्ट में बताया गया कि करीब 2500 मीटर की ऊंचाई तक के क्षेत्र इससे प्रभावित हो सकते हैं, जबकि जिले का पाणा और ईराणी गांव करीब 21 सौ मीटर की ऊंचाई पर स्थित हैं। इसके बावजूद भी ग्रामीणों को अलर्ट नहीं किया गया।
जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी नंद किशोर जोशी का भी कहना है कि जब हिम्माच्छादित क्षेत्रों में हिमस्खलन होता है तो हिम्माच्छादित क्षेत्र के समीप वाले हिस्से में बर्फीले तूफान का खतरा बना रहता है।
इन दिनों बर्फ से ढके हैं घाटी के प्रभावित गांव
निजमुला घाटी के ठीक पीछे त्रिशूल और नंदा घुंघटी की बर्फीली चोटियां मौजूद हैं। हिमालय का यह क्षेत्र वर्षभर हिमाच्छादित रहता है।
शीतकाल में जब इन चोटियों पर नई बर्फ जमती है तो यहां हिमस्खलन की छोटी-छीटी घटनाएं होती रहती हैं, जिनका इन आवादी क्षेत्रों में कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस बार यहां हिमस्खलन बडे़ पैमाने पर हुआ है।
शीतकाल में बर्फबारी के बाद पाणा, ईराणी और झींझी गांव भी बर्फ से ढके रहते हैं। इन गांवों में इन दिनों एक से पांच फीट तक बर्फ जमी हुई है।
स्थानीय निवासी भरत सिंह, भजन सिंह, महेंद्र सिंह, कमल सिंह और इंद्र सिंह का कहना है कि गांव के ठीक पीछे स्थित त्रिशूल पर्वत पर बीते वर्षों में छिटपुट हिमस्खलन की घटनाएं देखी गई हैं।
मौसम परिवर्तन तूफान का कारण निजमुला घाटी में इस बार समय से पहले बर्फबारी हुई है। अमोमन यहां 15 जनवरी के बाद ही बर्फबारी होती है, लेकिन इस बार ठीक एक माह पूर्व यानि 14 दिसंबर को भारी बर्फबारी हुई।
इसके बाद भी दो बार बर्फबारी हुई, जिससे घाटी के गांव अभी भी करीब दो फीट बर्फ की आगोश में हैं। इसे मौसम में हो रहे परिवर्तन का असर भी माना जा रहा है।a
निजमुला घाटी में बर्फीले तूफान के बाद मची अफरा-तफरी के बाद भी जिले में आपदा प्रबंधन का सेवन डेस्क सिस्टम हरकत में नहीं आया। जिससे जिले में एक बार फिर आपदा प्रबंधन की पोल खुल कर रह गई है।
बीती रात जब घाटी में बर्फीले तूफान का कहर रहा तो जिले के आला अधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं थी। सुबह जब साढे़ नौ बजे एक ग्रामीण द्वारा फोन पर यह सूचना दी गई तो इसके बाद भी कोई अलर्ट जारी नहीं हुआ।
जब मीडिया कर्मियों द्वारा विभागीय अधिकारियों से मामले की जानकारी मांगी गई, इसके बाद प्रशासन हरकत में आया और तहसील व आपदा प्रबंधन की टीमें प्रभावित क्षेत्र के लिए रवाना की गई।
हिमस्खलन सामान्य प्रक्रिया है। पहाड़ों की ढाल बर्फ को रोक नहीं पाती हैं और गुरुत्वाकर्षण बल के कारण भी हिमस्खलन की घटनाएं होती हैं। जब उच्च हिमालयी क्षेत्र से तीव्र गति से बर्फ जब नीचे पत्थरों से टकराती है तो हवा के संपर्क में आने पर आसपास तेज बर्फीली हवाएं चलती शुरू हो जाती हैं, क्योंकि इस दौरान हवा का दाव कम हो जाता है। - डॉ. डीसी नैनवाल, भूगर्भवेता, पीजी कॉलेज गोपेश्वर, चमोली