अंग्रेजी के जाने-माने उपन्यासकार विक्रम सेठ का मानना है कि दिल और दिमाग से जो निकलता है, वही लिखना चाहिए। प्रकाशकों के दबाव में लिखने वाले लेखक नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि आज दुनिया में ई-बुक्स पढ़ने का प्रचलन बढ़ गया है। इसके बावजूद दुनिया के अधिकांश हिस्सों में मोटी-मोटी किताबें भी पढ़ी जाती हैं।
अमर उजाला से खास मुलाकात में विक्रम ने बचपन की कुछ यादें भी ताजा कीं। वे देहरादून के प्रसिद्ध दून स्कूल में पढ़ते थे। उनके लिए लेखक बनना एक रहस्य है।
वे अर्थशास्त्री बनना चाहते थे। कहा कि, न जाने कैसे लेखक बन गए। यह उन्हें भी नहीं मालूम। गोल्डन गेट से उन्हें बड़ा ब्रेक मिला। उसके बाद से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। लेखक विक्रम सेठ लंढौर स्थित अपने भाई शांतनु सेठ के आवास पर आए हुए थे।