फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

उत्तराखंड को लेकर अधूरी रह गई कलाम की 'अनोखी' तमन्ना

Thu, 30 Jul 2015 09:21 AM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
विज्ञापन
विज्ञापन
मिसाइलमैन डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम पहाड़ की पथरीली जमीन को हरभरा और खेती करने लायक बनाना चाहते थे।
विज्ञापन


इसके लिए उनकी योजना थी कि पहाड़ों के पथरीले इलाकों में गड्ढे बनाए जाएं और उसमें मिट्टी भरकर फसल उगाई जाए।
16 अक्तूबर 1993 को डॉ. कलाम तत्कालीन थल सेनाध्यक्ष जनरल बीसी जोशी के साथ पिथौरागढ़ आए थे। तब डॉ. कलाम डीआरडीओ में वैज्ञानिक थे।

उसके बाद वह 7 मई 1997 को पिथौरागढ़ स्थित रक्षा कृषि अनुसंधान प्रयोगशाला के निरीक्षण के लिए आए थे। तब उनकी वरिष्ठ पत्रकार बीडी कसनियाल के साथ विस्तार से बातचीत हुई। डॉ. कलाम पहाड़ में कृषि उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए बड़ी सोच रखते थे। उन्होंने तब रक्षा कृषि अनुसंधानशाला के वैज्ञानिकों को लैब टू लैंड का विचार दिया था।

श्री कसनियाल ने बताया कि डॉ. कलाम उबड़-खाबड़ पहाड़ों में भी फसल उगाने का विचार रखते थे। वह चाहते थे कि पहाड़ों के ढलानों को भी खेती के लायक बनाया जा सकता है और इनका उपयोग हो सकता है। डॉ. कलाम को सिकुड़ती जा रही कृषि योग्य जमीन को लेकर गंभीर चिंता थी।
विज्ञापन
विज्ञापन

देश को इतना चिंतनशील वैज्ञानिक नहीं मिल सकता

डॉ. कलाम कहते थे कि कृषि योग्य जमीन पर तो शहर बसने लगे हैं। अब ऐसी जमीन को खेती के उपयोग में लाया जा सकता है, जिसका अब तक किसी भी रूप में कोई इस्तेमाल ही नहीं हुआ है। यह बात अलग है कि पहाड़ की पथरीली और ढलान वाली जमीन में खेती करने की दिशा में अब तक कोई पहल नहीं हो पाई है।

डॉ. कलाम पूर्व सैनिकों की ऊर्जा का इस्तेमाल पशुपालन और बागवानी विकास में करने के पक्षधर थे। वह चाहते थे कि पूर्व सैनिकों को पशुपालन और बागवानी के लिए सुविधाएं दी जानी चाहिए। श्री कसनियाल ने उनके साथ 7 मई 1997 को हुई बातचीत के आधार पर बताया कि मिसाइलमैन को हर विषय की समग्र जानकारी थी।

वह देश के विकास के लिए नए प्रयोग करने के पक्ष में रहते थे। वह लोगों की ऊर्जा का सही इस्तेमाल करना चाहते थे। डॉ. कलाम 2002 में देश के राष्ट्रपति बने, लेकिन उसके बाद उनको सीमांत जिले के भ्रमण का अवसर नहीं मिल पाया।

जिन लोगों की तब डॉ. कलाम से मुलाकात हुई थी वह उनके व्यक्तित्व से इतने ज्यादा प्रभावित थे कि कई दिनों तक इसी का जिक्र करते रहे। श्री कसनियाल कहते हैं कि देश को इतना चिंतनशील वैज्ञानिक नहीं मिल सकता, जो हर छोटी चीज को भी विज्ञान के नजरिए से देखा करता हो।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें