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#KabTakNirbhaya: बोली अपराजिताएं, सीख लड़कियों को ही क्यों? सोच लड़कों की भी बदलनी होगी 

Mon, 02 Dec 2019 09:16 AM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून

सार

  • हैदराबाद में हुए कांड के बाद अमर उजाला संवाद कार्यक्रम में बुद्धिजीवियों ने रखी राय 
  • कानून के डर के साथ-साथ लड़कों को संस्कारी बनाना ज्यादा जरूरी
     
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देहरादून में अपराजिता के तहत कार्यक्रम - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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दुष्कर्म की घटनाओं के बाद हर बार सतर्क रहने, अच्छे-बुरे की समझ रखने, आत्मरक्षा का प्रशिक्षण आदि जैसी सीख सिर्फ लड़कियों को ही दी जाती है। जबकि इसके लिए जिम्मेदार लड़कों के लिए किसी फोरम पर आज तक कोई बात नहीं उठी। समाज को लड़कों की सोच बदलने के प्रयास करने चाहिए। ये सवाल और राय रविवार को अमर उजाला के संवाद कार्यक्रम में बुद्धिजीवियों की परिचर्चा में सामने आए। इनमें पुलिस, समाजसेवी, अधिवक्ता और कई छात्र आदि शामिल हुए।

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रविवार को संवाद कार्यक्रम में पुलिस अधीक्षक नगर श्वेता चौबे ने कहा कि हैदराबाद में पशु चिकित्सक से दुष्कर्म और उनकी हत्या की घटना के बाद से देश में उबाल है। दिल्ली के निर्भया कांड जैसा यह मामला है। ऐसे में देश में फिर चर्चाओं-परिचर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। लेकिन, इन सबके बीच यही बात हो रही है कि लड़कियों को आसपास के माहौल को समझना होगा।

अच्छी-बुरी नजर की पहचान करानी होगी। यह हर बार की कहानी है। लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारे समाज में लड़कों की स्थिति ठीक है? क्या उनकी सोच महिलाओं और लड़कियों के प्रति बदल रही है? नहीं, समाज ने इस ओर अब तक कोई कदम ही नहीं उठाए हैं। अभी तक कोई परिचर्चा ऐसी नहीं हुई, जहां लड़कों को यह बताया गया हो कि वे अपनी सोच बदलें। 

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स्थिति में सुधार सिर्फ कानूनों के बदलाव से नहीं, घर के संस्कारों से होगा

बार एसोसिएशन के अध्यक्ष मनमोहन कंडवाल ने कहा कि कानून पहले से सख्त हुआ है। अदालतों में ट्रायल के समय में भी कमी आई है। अपराधी सलाखों के पीछे पहले से जल्दी पहुंच रहे हैं। कानून का डर पहले से ज्यादा है। लेकिन, स्थिति में सुधार सिर्फ कानूनों के बदलाव से नहीं बल्कि घर के संस्कारों और सीख से होगा। 

वरिष्ठ अधिवक्ता आरएस राघव ने कहा कि हैदराबाद में हुआ मामला देश का पहला और अंतिम मामला नहीं है। ऐसे में समाज के हर वर्ग को इस तरह की रणनीति बनाकर काम करना होगा, जिससे इस तरह के मामले फिर न हों। इसके लिए जरूरी है कि हम अपनी सोच बदलें। समाज को कैसे बदला जाए इसका खाका हमें खींचना होगा। 

परिचर्चा में यह रहे मौजूद 
सोशल वर्कर सुमन काला, जगमोहन मेहंदीरत्ता, बार एसोसिएशन अध्यक्ष मनमोहन कंडवाल, अधिवक्ता आरएस राघव, अल्पना जदली, सोशल वर्कर लक्ष्मी बिष्ट, ऋतु शर्मा राजनीतिक कार्यकर्ता, तुलसी सोम, रेणु यदुवंशी, विजयश्री अध्यापिका, प्रिया गुलाटी, जयश्री, नूपुर मोहंती, प्रभा शाह, वीना, दीपा शर्मा, गरिमा शर्मा, मोनिका, भावना, मंजू जैन और उमा सिसौदिया।
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बतानी होगी हर बात तभी दरिंदों को मिलेगी सजा 

पुलिस अधीक्षक नगर श्वेता चौबे ने बताया कि हमेशा से समाज की यह धारणा रही है कि जो हुआ होने दो। शिकायत करेंगे तो बदनामी होगी। इस चक्कर में कई अपराधी बच जाते हैं। एक घटना का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि शहर से सटे एक इलाके में सामूहिक दुष्कर्म की पीड़िता के परिवार वाले घटना की रिपोर्ट दर्ज नहीं कराना चाहते थे। ऐसे में मुझे डेढ़ दिन लगा उन्हें यह समझाने में कि इसमें उन्हीं की भलाई है।
 
उनका नाम कहीं सामने नहीं आएगा। महिलाओं ने भी अपने-अपने अनुभवों को कार्यक्रम में साझा किया। कई वक्ताओं ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। एक महिला ने कहा कि वह एक बच्ची को लेकर थाने गईं तो बच्ची को ही गलत ठहराने का प्रयास किया जाने लगा। शिकायत अधिकारियों से भी की। लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। अंत में न्यायालय की शरण ली तो पीड़िता को न्याय की आस जगी। 

पहले से ज्यादा संवेदनशील बनाई जा रही है पुलिस 
पुलिस अधीक्षक नगर ने महिलाओं को देहरादून में सुरक्षा के प्रति आश्वस्त किया। बताया कि पुलिस को अब पहले से ज्यादा संवेदनशील बनाने पर जोर दिया जा रहा है। कांस्टेबल स्तर पर अधिक से अधिक लड़कियों की भर्ती की जा रही है। ताकि कोई पीड़ित लड़की अपनी बात आसानी से रख सके।

देहरादून में बनने जा रहा है महिला थाना 
महिलाओं को शिकायत करने के लिए पुलिस एक अलग से मंच तैयार करने जा रही है। इसके लिए देहरादून में महिला थाने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है। जल्द मंजूरी मिलने की संभावना है। बता दें कि अभी तक प्रदेश में श्रीनगर में ही महिला थाना है। इसमें सभी कार्मिक महिलाएं होती हैं।
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