अमेरिका में दलदल वाले स्थानों पर सड़क और रास्तों के निर्माण में प्रयोग होने वाली जीओ सेल तकनीक अब केदारधाम में भी अपनाई जाएगी। भारत में सबसे पहले यहीं इस विधि का प्रयोग हो रहा है।
दलदली जमीन पर सुरक्षित सड़क के लिए जीओ सेल का उपयोग किया जाता है। आईआईटी रुड़की ने भी इस विधि को उपयुक्त माना है। आपदा के बाद पुनर्निर्माण के दौर से गुजर रहे केदारनाथ में एमआई-26 हेलीपैड से मंदिर परिसर और वैली ब्रिज तक जीओ सेल तकनीक से रास्ता तैयार किया जाएगा।
ट्रायल के तौर पर कुछ मीटर रास्ता बनाकर पोकलैंड मशीन गुजार कर परीक्षण भी किया गया। सफलता के बाद जिलाधिकारी ने भी आगे के मार्ग निर्माण के लिए हरी झंडी दे दी है।
नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (निम) के प्राचार्य कर्नल अजय कोठियाल ने बताया कि केदारनाथ में जीओ सेल (अमेरिकी तकनीक) से रास्ता बनाने में आईआईटी रुड़की के छात्र रहे प्रो. संदेश अदेलकर ने मदद की है।
जानिए, क्या है जीओ सेल
जीओ सेल, पॉली यूरेथीन और पॉली बेनायल फ्लोराइड से बनी लचीली प्लास्टिक जाली होती है। यह 350 से 500 एमएम तक मोटी, ढाई मीटर लंबी और आठ फीट चौड़ी होती है। इसकी लंबाई-चौड़ाई सड़क और रास्ते के निर्माण के हिसाब से कम-ज्यादा हो सकती है।
जहां पर रास्ता बनाया जाता है, वहां पर इन जालियों को बिछाकर इसके अंदर कंक्रीट, बजरी, रेत, पत्थर भरे जाते हैं। इससे यह खिसकता नहीं है। रास्ते की लंबाई के साथ-साथ कहां पर कितना ढलान देना है, इसका भी ध्यान रखा जाता है। इसके ऊपर से भारी ट्रक गुजारने पर भी कोई असर नहीं होता।
इनका है कहना
केदारनाथ में भी भू-धंसाव का खतरा बना रहता है। ऐसे में जीओ सेल विधि केदारनाथ के लिए मुफीद साबित हो सकती है। एक किमी रास्ते का निर्माण इस विधि से होना है, जिस पर कम से कम 15 लाख रुपये का खर्च आएगा।
-संदेश अदेलकर, निम के तकनीकी सलाहकार