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अमर उजाला एक्सक्लूसिव : हींग की खेती को उत्तराखंड भी तैयार, बन सकती है आर्थिकी का मजबूत आधार

Mon, 26 Oct 2020 02:15 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal राकेश खंडूड़ी, अमर उजाला, देहरादून
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हींग के फायदे - फोटो : Facebook/Asafoetida
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दाल, सब्जी और सांभर में अनूठी सुगंध और स्वाद घोल देने वाली हींग राज्य के उच्च हिमालय शुष्क क्षेत्र में भी उगाई जा सकती है। अभी देश में हींग अफगानिस्तान, ईरान और उज्बेकिस्तान से खरीदी जाती है। हिमाचल के शुष्क हिमालयी क्षेत्र लाहुल घाटी में हींग की खेती का प्रयोग शुरू हो गया है। पड़ोसी राज्य के इस प्रयोग के साथ ही उत्तराखंड राज्य में भी हींग की खेती की संभावना तलाशने की तैयारी है।

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पलायन आयोग के उपाध्यक्ष डॉ.एसएस नेगी के मुताबिक, सीमांत जिले पिथौरागढ़ के संबंध में आयोग ने जो रिपोर्ट तैयार की है, उसमें जिले के उच्च हिमालयी क्षेत्र की दारमा वैली में हींग की खेती की संभावना का उल्लेख है। बकौल नेगी, मैं दो नवंबर को कृषि विभाग के अधिकारियों के साथ एक बैठक कर रहा हूं। इस बैठक में अधिकारियों से हींग की खेती के संबंध में एक रिपोर्ट तैयार करने को कहूंगा। 

जानकारों का मानना है कि उत्तराखंड राज्य के सीमांत जिले उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ की उच्च हिमालयी शुष्क घाटियों में हींग की खेती पर कार्य हो सकता है। उत्तरकाशी की नेलांग और पिथौरागढ़ की दारमा वैली और चमोली की नीति घाटी हींग की खेती के लिए मुफीद है। हालांकि राज्य के कृषि विभाग और पंतनगर कृषि विवि के स्तर पर अभी तक ऐसा कोई प्रयोग नहीं हुआ है। 
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पंतनगर विवि में संयुक्त निदेशक और औषधीय पौधों के विभाग के हेड डॉ. एमएस नेगी कहते हैं, हींग की खेती अफगानिस्तान के उस इलाके में होती है जो शुष्क शीत क्षेत्र है। राज्य में उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ऐसी संभावना हो सकती है। लेकिन, इसके लिए अनुसंधान कार्य करना होगा।

अभी विवि के स्तर पर हींग की खेती के संबंध में किसी परियोजना पर कार्य नहीं हो रहा है, लेकिन राज्य सरकार चाहे तो इस प्रोजेक्ट पर कार्य हो सकता है। बता दें कि हिमाचल में सीएसआईआर के सहयोग से हींग की खेती की तकनीक विकसित हुई है। उत्तराखंड सरकार प्रयास करे तो सीएसआईआर व हिमाचल सरकार से बात कर हींग की खेती की संभावना को विस्तार दिया जा सकता है।

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हींग की खेती का मतलब

हींग फेरुला एसाफोइटीडा के जड़ से निकाले गए रस से तैयार किया जाता है। यह इतना आसान नहीं एक बार जब जड़ों से रस निकाल लिया जाता है तब हींग बनने की प्रक्रिया शुरू होती है। हींग दो तरह का होता है- काबुली सफेद और लाल। सफेद हींग पानी में घुल जाता है जबकि लाल या काला हींग तेल में घुलता है।

कच्चे हींग की गंध तीखी होती है। उसे खाने लायक नहीं माना जाता। खाने लायक गोंद और स्टार्च को मिलाकर उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में तैयार किया जाता है। हींग की कीमत इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें क्या मिलाया गया है। हींग पाउडर भी मिलता है। दक्षिण भारत में हींग को पकाया जाता है। पके हुए हींग के पाउडर का इस्तेमाल मसालों में किया जाता है।

प्रयोगशाला का कमाल

हिमाचल के पालमपुर में इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन बायोरिसोर्स टेक्नोलॉजी के प्रयासों से राज्य के हिमालयी मरुस्थली क्षेत्र लाहुल घाटी के किसानों ने हींग की खेती को अपना लिया है।

भारत बड़ा बाजार

भारत हींग का बड़ा बाजार है। पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, भारत ने पिछले साल करीब 1500 टन हींग आयात की। इस पर करीब 942 करोड़ खर्च हुए। यानी उत्तराखंड के सीमांत इलाकों में हींग की खेती होती है तो वहां के किसानों को फसल बेचने के लिए बाजार नहीं तलाशना होगा।

हमारी कोशिश है कि सीमांत क्षेत्रों में पारंपरिक खेती से हटकर ऐसी फसलों को प्रोत्साहित किया जाए जो वहां के लोगों की आमदनी में बढ़ाने में मदद करें। हींग इनमें से एक प्रमुख फसल है। इस संभावना पर विचार चल रहा है। डीआरडीओ की लैब्स को सीमांत इलाकों की खेती से जोड़ने पर चर्चा हुई थी। सरकार के स्तर पर प्रयास चल रहे हैं।
- त्रिवेंद्र सिंह रावत, मुख्यमंत्री
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